ताँका की महक (पुस्तक समीक्षा)–  ~ डाॅ. मिथिलेश दीक्षित 

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PRADEEP KUMAR DASH Thu, Oct 31, 11:56 PM (11 hours ago)
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Tanka Ki Mahak ( ताँका की महक )   A great collection of 271 hindi Tanka poet. [2017]● Editor : PRADEEP KUMAR DASH “Deepak”● Publisher : Ayan prakashan Delhi● Price : ₹ 500● Availability :      • www.surtacg.com      • pkdash399@gmail.com      • Ayan prakashan Delhi______________________________________________________
“ताँका की महक” : ताँका विधा का सर्वथा प्रथम वृहद् संकलन ।
            समीक्षिका – डाॅ. मिथिलेश दीक्षित
    ताँका जापान का बहुत प्राचीन काव्य-रूप है । यह अतुकान्त वर्णिक छन्द है । इसमें लयात्मकता अनिवार्य नहीं है, परन्तु यदि है, तो छान्दसिक सौन्दर्य बढ़ जाता है । जापानी भाषा में वर्णों के स्वरान्त होने से लयात्मकता स्वाभाविक रूप से रहती है । ताँका “ताँका” का ही एक प्रकार था और वहाँ इसे लघु गीत कहा गया । जापान के वृहद् काव्य-संकलन “मान्योशू” जिसमें तीसरी शताब्दी से आठवीं शताब्दी तक की ताँका, चोका, सेदोका कविताएँ संकलित हैं, इसमें चार हजार से भी अधिक ताँका कविताएँ संकलित हैं । 05-07-05-07-07 अक्षरक्रम की पाँच पंक्तियों की ताँका कविता राज्याश्रय में प्रतिष्ठित हो कर, जापान की बहुप्रचलित और चर्चित कविता के रूप में प्रसिद्ध हुई ।                यह कविता प्रतियोगिताओं का भी माध्यम बन चुकी थी और इसमें एक व्यक्ति द्वारा प्रारंभिक तीन और अन्य के द्वारा दो पंक्तियाँ प्रस्तुत की जाती थीं । इस प्रकार “रेंगा” अर्थात श्रृंखलित कविता का प्रचलन हुआ । बाद में इसकी 05-07-05 अक्षर क्रम की प्रारंभिक तीन पंक्तियों की संक्षिप्त कविता  का प्रचलन हुआ, जिसे हाइकाई या होक्कू / होक्कु आदि नाम दिये गये । बाद में “हाइकु” नाम से यह कविता साहित्य जगत् में प्रसिद्धि को प्राप्त हुई ।                 हिन्दी में कदाचित् डाॅ. प्रभाकर माचवे के कतिपय ताँका “सूत्रकार” (1963) में प्रकाशित हुए थे । अज्ञेय जी ने कुछ ताँका के अनुवाद किये थे, जो संभवतः “नया प्रतीक” (अक्टूबर,1975 अंक) में प्रकाशित हुए थे । सत्यपाल चुघ ने अनेक ताँका कविताओं का सृजन किया था, जो उनके “वामन के चरण” संकलन में संकलित हुए हैं । प्रो. सत्यभूषण वर्मा की “जापानी कविताएँ” (1977) में दस ताँका के अनुवाद संकलित हैं । सत्यपाल चुघ के ताँका मौलिकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं । डाॅ. अंजलि देवधर ने “100 कवियों की 100 कविताएँ” नाम से क्ले मैकाले की जापानी से अंग्रेजी में अनूदित पुस्तक “ओगुरा ह्याकुनिन इश्शु” का अनुवाद किया । ताँका के प्रारंभिक विकास में प्रो. आदित्य प्रताप सिंह का प्रदेय स्मरणीय है । ‘सुधा बिन्दु’ (वर्ष, 14 अंक – 08, अगस्त 1975 पृ. 07) पत्रिका में स्पष्ट उल्लेख है कि “हाइकु, सिजो, सिनरयु और ताँका हिन्दी कविता की उपलब्धियाँ हैं । विदेशी धरती से इन्हें अपनी धरती पर लाने का श्रेय प्रो. आदित्य प्रताप सिंह को है जो विदेशी साहित्य का अध्ययन करते-करते इन्हें भी हस्तगत कर बैठे ।”                 हिन्दी में स्फुट रूप से कुछ ताँका लिखे गये, परन्तु पुस्तक रूप में 2009 में डाॅ. उर्मिला अग्रवाल के ताँका प्रकाशित हुए । उसके बाद डाॅ. रमाकान्त श्रीवास्तव, डाॅ. सतीशराज पुष्करणा, पुष्पा जमुआर, डाॅ. मिथिलेश दीक्षित, मिर्जा हसन नासिर, आचार्य भगवत दुबे, डाॅ. मनोज सोनकर, डाॅ. रामनिवास ‘मानव’, डाॅ. कुमुद रामानन्द बंसल आदि हाइकुकारों के ताँका संकलन प्रकाशित हुए । प्रकाशन की गति अवरुद्ध नहीं हुई है, आज भी श्री प्रदीप कुमार दाश “दीपक” जी ताँका की महक सर्वत्र प्रसारित कर रहे हैं । ताँका कविता के कतिपय समूह संकलन भी निर्गत हुए हैं, परन्तु प्रस्तुत संकलन इस विधा का सर्वथा प्रथम वृहद् संकलन है, जिसका सम्पादन प्रदीप जी ने उत्कृष्टता से किया है ।                दो खण्डों में विभक्त वृहद् संकलन “ताँका की महक” में देश के लगभग 271 ताँकाकारों के ताँका संग्रहित हैं । प्रथम खण्ड में पचास लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकारों के 1200 ताँका हैं तथा द्वितीय खण्ड में 221 रचनाकारों के एक-एक ताँका प्रस्तुत किये गये हैं । विषय-वैविध्य के साथ इन रचनाओं में शैल्पिक वैशिष्ट्य भी देखा जा सकता है । सामयिक परिवेश में व्याप्त विभिन्न विसंगतियों पर यदि अभिधा एवं लक्षणा के माध्यम से रचनाकारों ने अपने संवेदन को व्यक्त किया है तो प्रकृति का भी बिम्बपरक प्रतीकात्मक चित्रण किया है । जापान में ताँका लघुगीत के रूप में प्रसिद्ध हुआ था । हम यदि इस लघु कविता के प्रभावपूर्ण कथ्य और सुन्दर कलेवर पर विचार करें, तो दिनकर की पंक्तियाँ स्मरण हो आती हैं —–           ” छोटे गीत             जो कण्ठ से आ कर,             अधरों पर मर जाते हैं ;             काल उन्हें नहीं डसता है ,             उनके भीतर             जीवन का पीयूष बसता है ।”    □  दिनकर, ‘हारे को हरिनाम’ पृष्ठ -104            ताँकाकारों की इन प्रतिनिधि रचनाओं में सामाजिक परिदृश्य के विविध रूप चित्रित हैं, तो प्रकृति के विभिन्न उपादानों की विविध भंगिमाएँ भी अनेक रूप में वर्णित हैं ।           बदलते परिवेश में स्वार्थपरक बदलाव के अनेक प्रसंग ताँकाकारों की गहन अनुभूति को दर्शित कर रहे हैं । घर-परिवार के बदलते, दरकते, टूटते और बिखरते रिश्तों का सहज मूल्यांकन अत्यन्त मर्मस्पर्शी है । वृद्धावस्था में आत्मीयजन द्वारा छोड़ देने की विडम्बना, फूलों से शुरू होकर, शोलों पर खत्म होने वाली प्रेम की यात्रा, बदलते समय के उजड़ते उपवन, भावनाओं के रुदन और मन की टूटन, दुबकती ओस के रूप में सिसकते चाँद के आँसू के दृश्य ताँकाकारों के सामयिक बोध, गहन संवेदन और सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि के परिचायक हैं ।                इन रचनाओं द्वारा प्रकृति का मानवीकरण पद्धति में चित्रांकन ध्यान आकृष्ट करता है । अपने शीश पर ओस की बूँद को सम्भाले हुए दूब रूपी नटिनी प्रभावित करती है, कहीँ शरद ऋतु के पूनम की चाँदनी आकृष्ट करती है । भोर के आते ही रात भी अपनी स्याह रजाई लपेट कर चल देती है और हरसिंगार जब आँगन में झरने लगता है, तो सुबह की पांखुरी ओसारे में महक-महक उठती है । कुनमुनाता चाँद जब अकेला ही चल पड़ता है, तब झील की पगडंडी मुस्करा उठती है । मूक दिवाकर किरण पुंजों की गठरी ले कर चल देता है, तो साँझ और अधिक श्यामल होने लगती है । इस प्रकार इन रचनाओं में कहीं कथ्य की सहजता है, कहीं शिल्प का नूतन सौष्ठव है ।              प्रस्तुत संकलन का संयोजन और प्रस्तुतीकरण निश्चित ही श्रमसाध्य साहित्यिक कार्य है । भाई प्रदीप कुमार दाश जी का यह महत्वपूर्ण कार्य ताँका – साहित्य के इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान अंकित करायेगा । मंगलकामनाओं के साथ …….                                                                                                                                         ~ डाॅ. मिथिलेश दीक्षित                                                             अध्यक्ष- हिन्दी हाइकु परिषद                                                                  संपादक : हाइकु लोक                                                       सम्पर्क – जी-91,सी, संजयगान्धी पुरम्                                                             लखनऊ – 226016 [ उ.प्र. ]

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