कर्म पर मानव तेरा अधिकार है–Anil Mishra Prahari

Anil Mishra Prahari <anilmishraprahari1363@gmail.com> Thu, Oct 31, 7:03 PM (16 hours ago)
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                  गीता-ज्ञान।

           कर्म पर मानव तेरा अधिकार है।

कर्म करता चल, न सोचो क्या मिला
शूल  डालों  पर  सजा या गुल खिला,
हो नहीं  आसक्ति   फल  में भी कभी
पूर्ण  हो  न  हो , करम  तू  कर  सभी,
समत्व  का  रख  भाव,  इसमें योग है
कर्म   जो   सकाम   भीषण   रोग   है।
             भागता  फल की तरफ संसार है
             कर्म पर मानव तेरा अधिकार है।

भूल जा  क्या पुण्य औ क्या पाप है
इन  विचारों  में   जकड़ता  आप  है,
कर्म -फल  को  त्याग  तो  तू मुक्त है
कृष्ण  की  वाणी  अमी  से  युक्त  है,
मोह बुद्धि  को सदा  करता   भ्रमित
कामना  से  युक्त  मन  करता अहित।
               है समर जग, कुछ नहीं उस पार है
               कर्म  पर  मानव  तेरा  अधिकार है।

सुख-दुखों  के  वेग से  जो  है  अलग
क्रोध, भय  के  शत्रु से भी जो  सजग,
शुभ-अशुभ से राग न ही द्वेष जिसका
शान्त मन होता सदा  ही उस पुरुष का,
सोच  विषयों की,  तुझे आसक्ति होगी
कामना, फिर क्रोध, कैसे भक्ति होगी?
                 श्री कृष्ण की गीता अनघ उपहार है
                 कर्म  पर  मानव तेरा अधिकार  है।

अनिल मिश्र प्रहरी।

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