लेाक मर्म हो तो लोक धर्म है–प्रभा पारीक

prabha pareek 4:07 PM (26 minutes ago)
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                      लेाक मर्म  हो तो लोक धर्म है।
लोक मानस को जानने पहचानने के लिये जरूरी है कि उनके लोक मर्म की भावना से भी अवगत रहें। श्रीराम मर्यादा पुरूषोंत्तम कहलाये क्यों कि उन्हांेने धर्म के मूल भाव को अपनाया और उसे ही धर्म का स्थान दिया। ’’परहित सरिस धरम नहीं भाई. पर पीडा सम नहीं अधिमाई। आज हमारे समाज में समूह भावना व परस्पर सहयोग का नितांत अभाव होता जा रहा है। लोक जीवन मनुष्य को समूह मन से जोड़ता है। सब को धर्म मार्ग पर चलने का संदेश देता है भगवान राम भी तो इसी मार्ग पर चलकर दे पाये यह संदेश। क्योंकि प्रत्येक धर्म में ही किसी को ’बुरा, पापी’ कहना गलत माना गया है। ईश्वर सब में समान रूप से है यदि हमने हमारे वर्तमान का गठन अपने भूत से किया है तो हमारा वर्तमान ही हमारे भविष्य का गठन कर रहा है। मोहम्द साहब का एक छोटा सा संदेश है आसमान वाला तुम्हारे लिये रहम के दरवाजे भी खोलेगा जब तुम जमीन वाले पर रहम करोगे’’।

कार्तिक मास में अमावस्या को मनाये जाने वाला पंच महापर्व दीपावली ना केवल हिन्दु धर्म का सबसे प्राचीन पर्व है बल्कि इसकी परंम्परा में स्वछता ,शुद्धता और शुभता का वैज्ञाानिक संदेश और महत्व भी छुपा हुआ है।क्यों कि इस त्यौंहार की तैयारी घर की साफ सफाई ,आस पास के कूड़े कचरे को हटाने से होती है । मान्यता के अनुसार लक्ष्मी को प्रसन्न करने व  उसके प्रवेश के लिये घर की सफाई कर शुद्ध किया जाता है लेकिन साल में एक बार इसकी दशा बदलने से शारीरिक मानसिक और आघ्यात्मिक ढेर सारे लाभ हैं वास्तु के अनुसार घर की दशा बदलने के लिये ।  दिशा का बदलना अनिवार्य होता है दिपावली पर घर को फिर से सजाने के दौरान इस ताजगी सकून और बदलाव का अहसास तो होता ही है।
चाहे राम के अयोध्या आगमन पर त्रेता युग में आसपास की गलियां साफ गई हों, लेकिन कलियुग में भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता बहुत जरूरी है यह संयोग ही है कि अपनी बात समझाने के लिये प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को गांधी वाले स्वच्छता अभियान की याद दिलावानी पड़ी।
सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव का पर्व है दीपावली आज के दौर में सर्वाधिक प्राासंगिक है पांच पर्वो के मिलन का मौका पर्व लाता है स्वच्छता एकता और सम्पन्नता का संदेश
1 प्राचीन समय में अलग से स्वछता अभियान चलाने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती थी दिपावली सिखाती थी अपना अपना घर साफ, आंगन साफ मोहल्ल साफ तो इलाका साफ….और पूरा गांव कस्बा साफ यह हुआ त्योहार पर स्वछता मिशन।
2-दीपावली एक मात्र एैसा पर्व है जिसे हर जाति समुदाय के लोग मनाते है स्वेच्छा से कटटरता और भेदभाव आड़े नहीं आते।
3 घरेलु वस्तुओ ंके बदलाव और नया खरीदने के प्रचलन से हर वर्ग के व्यवसायी को मिलती है लक्ष्मी । माटी के दिये बनाने वाले खील बताशे बनाने वाले और कचरा उठाने वाले व कबाड़ वाले तक को मिलता है रोजगार।
4 पर्व में छिपे हैं आघ्यात्मिक चेतना के रहस्य- पर्व में छिपे है वैज्ञानिक कारण और है-प्रदुषण रहित पर्यावरण और कोने काने में दीप प्रज्वलित करने से नकारात्मक उर्जा नष्ट होकर सकारात्मक उर्जा को स्थापित करता है।
भारत ही ऐसा देश है जिसके अध्यात्म व पुराण में सम्पूर्ण विज्ञान छुपा हुआ ह।ै हर त्यौहार व परम्परा के पीछे एक पौराणिक कहानी के अलावा वैज्ञाानिक तर्क है। जिसके कारण हिन्दुस्तान की संस्कृति में कोई भी पर्व व परंम्परा ऐसी नहीं है जो नई पीढ़ी के काम की नहीं हो, कम्प्यूटर डिजिटल युग ही नहीं रोबोटिक दौर में भी दीपावली जैसा पर्व प्र्रासंगिक ही है और रहेगा।
हर समाज-घर्म में त्यौहारो के मनाने के तरीके विधि विधान अलग हो सकते हैं लेकिन हर त्यौहार के पीछे आस्था -परम्परा विश्वास के साथ आनन्द की अनुभूति होती ही है । सभी त्यौहारो से कोई न कोई पौराणिक कथा जुडी है इन कथाओं का संबध आस्था से होता है। यही कथाए आस्था के जरिये संस्कार और संस्कृति को पीढी दर पीढी स्थान्तिरित करती रहती है कथाए नई पीढी को पथ भ्रष्ट होने से बचाती हंै और त्योहार सबको समाज और देश की जडो़ से जुडे रखने का माध्यम बनते हैं।
 चाहे रावण को मारकर राम अयोध्या लौटे हो या दीपावली के दिन नरकासुर और हिरण्यकश्यप का वध किया हो इन सभी कथाओं के मूल में अत्याचार से मुक्ति ही है सिक्खों की मान्यता के मुताबिक गुरू हर गोविन्द सिंहजी को कारागार से मुक्ति मिली थी। यही दिन था भगवान महावीर के निर्वाण का दिन यानी मानव जाती के ज्ञान के प्रकाश का दिन यानी ज्ञान की रोशनी से दीप जलाने का इन्ही दिनो ंमेु बुद्ध का आगमन हुआ था तो उनका दपों से स्वागत का दिन, सत्य शान्ति अहिंसा का स्वागत ….कुल मिलाकर दीपावली बुराई दुखः दर्द अवसाद से उभरने का पर्व और खुशीयों का त्योहार है जो हर साल एक अवसर बन कर आता हे ऐसे में हमारी संस्कृति कहती है कि उस अवसर का दीप जलाकर अभिन्नदन करें… नई पीठी के साथ नई पीढ़ी को इसका महत्व भी समझायें ताकि परम्पराए जीवित रहें …. आओ परिवार के साथ इकठठे होकर खुशीयां मनाये इस सुन्दर प्रथा को हम स ब एक पीढ़ी से दूसरी पीढी को हस्तांतरित करें।
इस दिन आतिशबाजी का महत्व -मान्यता है कि इस दिन भगवान् विष्णु ने राजा बली को पाताल लोक का स्वामी बनाया था। और इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जान कर प्रसन्न्ता पूर्वक दीपावली मनाई थी इसी दिन समुद्र मंथन के समय क्षीर सागर से लक्ष्मी प्रकट हुई थी और भगवान विष्णु को पति स्वीकार किया था। इसी समय कृष्को के घर नवीन अन्न आते है जिसकी खुशी में दीप जलाये जाते है
बंगाल में दीपावली के दिन आतिशबाजी की प्रथा के पीछे यह भी घारणा है कि दीपावली अमावस्या से पितरो की रात आरंम्भ होती है कहीं वे मार्ग भटक न जाये इस लिये उनके लिये प्रकाश की व्यवस्था इस रूप में कि जाती है यह प्रथा बंगाल का विशेष प्रचलन में है
ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या की इस अंधेरी रात्रि अर्थात अर्ध रात्री में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक मे आती है और प्रत्येक सदग्रहस्थ के घर विचरण करती है जो घर हर प्रकार से स्वच्छ शुद्व और सुसज्ज्ति और प्रकाश युक्त होता है वहाॅ  आंशिक रूप से ठहरती है
दीपावली पर रात्रि के समय प्रत्येक घर में धनधान्य की अधिष्धात्री देवी महालक्ष्मी विघ्न विनाशक गणेश जी और विघा की देवी मातेश्वरी सरस्वति की पूजा की जाती है
कार्तिक अमावस्या के दिन भगवान श्री रामचन्द्र 14 वर्ष का वनवास काट अयोध्या लौटे थे तब अयोध्या वासियों ने राम के राज्यारोहण पर दीपमालायें जलाकर महोत्सव मनाया था।
इसी दिन गुप्त वंशिय राजा चंन्द्र गुप्त विक्रमादित्य ने अपने विक्रम संवत की स्थापना की थी घर्म गणित तथा ज्योतिष के दिग्गज विद्ववानों को आमंत्रित कर यह मुहूर्त निकलवाया कि नया संवत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मनाया जाय
इसी दिन आर्य समाज की संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का निवार्ण हुआ था
यह पौराणिक मान्यता है कि लक्ष्मीजी समस्त देवी देवताओं के साथ राजा बली के यहाॅ बंधक थी आज ही दिन भगवान् विष्णु ने उन्हे बंधन मुक्त किया था। बंधन मुक्त होते ही सभी राजा क्षीर सागर में जाकर सो गये इसलिये अब हमें अपने अपने धरों में उनके शयन का ऐसा प्रबंध करना चाहिये कि वे क्षीर सागर की और न जाकर स्वच्छ स्थान और कोमल स्थान शैया वह यहीं शयन करें जो लोग लक्ष्मी के स्वागत की उत्साह से तैयारी करते हेैं उनको छोड़कर वे कहीं भी नहीं जाती। रात्री के समय लक्ष्मी का अवहान करके उनका विधिपूर्वक पूजन करके विभिन्न प्रकार के मिष्ठान नैवेध अर्पण करना चाहिये, दीपक जलाना चाहिये दीपको की सर्वानिष्ट निवृति हेतु अपने मस्तक पर घुमाकर चैराहे श्मशान में रखने की मान्यता है ।
          — है कि लक्ष्मी पूजा के समय यदि चाँदी के लक्ष्मी गणेश की मूर्ति की स्थापना और उनकी पूजा कि जाये तो एसा करने से धन की वर्षा और्र  घर समृद्धि बढनेा  लगती है।
श्री यंत्र– को घन समृधि लाभ ऋण से मुक्ति आदि का यंत्र बताया गया है कहते हैं लक्ष्मी पूजन के दौरान स्थल पर इस यंत्र की स्थापना करनी चाहिए जिसके बाद के फायदे आपको साफ नजर आने लगेगे।
 मूति के अलावा मां लक्ष्मी की चरण पादुकाओं का भी काफी महत्व है चांदी से बनी पादुकांए पूजा स्थल पर रखे और उस दिशा में रखें जहां अपने घर में आप कैश जूलरी आदि रखते है मान्यता है कि कि पादुकाओं की वजह से लक्ष्मी जी की कृपा आपके घर पर हमेशा बनी रहती है इसकी स्थापना शुभ मुहूर्त देख कर करनी चाहिये।
कोडियों का संबध में मां लक्ष्मी की प्रसन्नता से जुडा है चुकिं कौडी समुद्र से निकलती है इसलिये ये कोडीयां घन समृद्धि केा अपनी और आकर्षित करती है इन्हें पूजन स्थल पर रखना शुभ माना जाता है।
दक्षिणावर्ती शंख- को काफी चमत्कारी माना जाता है कुछ लोगों का कहना है  िकइस शंख को पूजा स्थल या फिर अपने कैश और जूलरी रखने की जगह इसे रखें तो बहुत जल्द आप पर घन समृद्धि की बरसात होनी शुरू हो जायगी।
                                         प्रेषक प्रभा पारीक भरूच  

prabha pareek 4:08 PM (30 minutes ago)
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दिपावलीका अगला दिन नव वर्ष और सब रस(साबुत नमक)
गुजरात राज्य भारत का एक मुख्य राज्य जहाॅँ का इतिहास वीरता,प्रेम,शोर्य कला ,साहित्य, संस्कृति व सुख सम्पन्नताऔं के साथ संघर्ष भरीजीवन गाथाओं का भंडार है । यहा का सरल सादगी भरा जीवन देश में ही नही विदेशोंमें भी चर्चा कर विषय बना हुआ है।दिपावली का त्योहार पुरे भारत में हर्षेाउल्लास से मनायाजाता है। भारत के कुछ राज्यो में नव वर्ष का शुभारंभ अलग अलग तरह की  फसलों के तैयार  होने के बाद व त्योहारों के अनुसार माना जाताहै ।उसी संदर्भ में गुजरात में नव वर्ष दिपावली के अगले दिन अर्थात कार्तिक वदएकम् के दिन से माना जाता है । गुजरात में महिनों की शुरूआत अमावष्या के अगले दिनवद पक्ष से नया महिना श्ुारू माना जाता है इसलिये दिपावली का अगला दिन महत्व पूर्णमाना जाता है इसे नव वर्ष के रूप में मनाते है।इस दिन प्रातः चार बजे से ही नमक देने वालोंका सिलसिला शुरू हो जाता है। भोजन के सभी रसों का सार ,जिसे सबरस कहा जाताहै।जो की सकारात्मक उर्जा का स्त्रोत माना जाता है।गावों में ही नहीं  शहरो की गलियों में अशोक वृक्ष के पत्ते (आसोपालव) ं की व हजारे के फूलों की बन्दनवार के साथ सबरस लेा…. सब रस लो… कीगुहार सुबह चार बजे से ही शुरू हो जाती है। सब रस अर्थात साबुत नमक जिसे उस दिन सम्मानपूर्वक एक दुसरे को देना या खरीदना शुभ माना जाता है घर में शुभ ,शांति कापदार्पण अर्थात नव वर्ष में धन से सर्व प्रथम नमक मीठु खरीदना शुभ है।  भले मुठी भर ही क्यों न हो जिसे पूरेवर्ष संभाल कर रखा जाता है। दिपावली के अगले दिन पूरा परिवार प्रातःचार  बजे उठ जाता है।महिलायें उठ  कर पिछले दिन का कचरा एकत्रित करती हैं।सकारात्मकउर्जा के आमंत्रण आगमन की आशा से कचरा एकत्रित करने का पात्र जिसे सूपडी कहते हैं।  उसकी भी सम्मान से पूजा करती है। धर आंगन कोरंगोली से सजाना गुजरात की मुख्य परंम्परा हैं यु तो गुजरात में दिपावली के पहलेआने वाली एकादशी से आंगन में रंगोली सजाने की प्रथा हैं पर इस उिन की रंगोलीहर घर की विशेष ही होती हैं नव वर्ष की रंगोली को घर के प्रवेश द्वार पर हीबनाया जाता हैं लक्ष्मी के स्वागत व शुभ के आगमन की आशा और विश्वास के साथ । नववर्ष के आगमन की खुशी मे प्रातः पुनः दिपक जलाते है। आतीश बाजी करते हैसभी धर के बडो के चरण स्पर्श करके आर्शिवाद लेते है।और धर के बडे बुजुर्गबच्चो को पैसे भी देकर आशिष देते है सभी एक दुसरे को साल मुबारक कह करएक दुसरे को शुभ कामनायें देते है ।आपको जान कर आशचर्य  होगा की गुजरात की संस्कृति में जितना महत्वपुर्ण दिपावली का त्योहार  है ,उतना हीमहत्व पूर्ण है नया वर्ष जिसे स्थानिय भाषा में बेसतु वर्ष कहतेहै दिपावली के दिन नहीं वरन( बेसतु वरस, साल मुबारक) नव वर्ष के इस महत्व पूर्ण दिन सभी हर स्तर के लोग नयें वस्त्रपहनते हैं घर को यथा संम्भव सजाते है । सर्व प्रथम नहा धेा कर सबसे पहले मंदिरजा कर दर्शन करते है यथा संम्भव दान पुन्य करते है।तरह तरह के पकवान बनाते है। एकदुसरे के घर आने जाने का सिल सिला दिन भर क्या सप्ताह भर तक चलता है। गुजरात कामिलनसार स्वभाव जग विख्यात है।गुजरात पकवानो के लिये  वैसे ही विख्यात है।एक दुसरे के घर विविध पकवानोंका आन्नद लेने के बाद सुगंधित मुखवास( मुखशुध्धी सौफ सुपारी आदि) करना भीपरंपरा में शामिल है। इसतरह गुजरात अपने नव वर्ष का स्वागत साबुत नमक खरीद कर करता है जिसे वर्षभर संभाल का रखते है अगले नव वर्ष के आगमन तक मुठी भर नमक लाकर  हम अपने साथ ठेर सारी सकारात्मक उर्जा आशायेंआस्थ व विश्वासको संजोंकर रखते हैं पुराने नमक से हर घर के सदस्य की नजर उतारीजाती हैं अर्थात नकारात्म उर्जा को विदा किया जाता हैं
 प्रेषक प्रभा पारीक  


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