काले पोश एवं सफेदपोश –डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

लेख-सफेद पोश काले पोश

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Praveen Kumar Sun, Sep 22, 5:47 PM (12 hours ago)
to me, shikshakprabha

काले पोश एवं सफेदपोश           जीवन में न्याय का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सामान्य जीवन में प्रायः एक कहावत का प्रचलन है ,कि, केवल हमारे हाथ पैर हैं, जिससे हम अपना पेट भरते हैं ,परिवार का पालन पोषण करते हैं, परंतु दिमाग है ही नहीं। हम तो यंत्र हैं जैसा कहा हमने कर दिया। जितनी चाबी भरी उतना ही  खिलौना चलेगा। क्या सचमुच आज के समय में  दिमाग की आवश्यकता समाप्त हो गई है? क्या मानव यंत्र वत होकर रह गया है ?क्या शिक्षा का स्तर हमें केवल यंत्र मानव के रूप में ही देखना चाहता है? शिक्षा का मतलब वर्तमान में केवल लिखना पढ़ना ही रह गया है ।उसके बाद का विश्लेषण आपके पास नहीं है। क्या शिक्षा हमें जीवन यापन का साधन ही सिखाती है ?क्या जानवरों को जीवन यापन करने के लिए शिक्षा की आवश्यकता होती है ?वे भी जीवन यापन कर लेते हैं ।जिन का बौद्धिक स्तर अच्छा होता है,वे प्रशिक्षित भी हो जाते हैं, तो ,क्या वे यंत्र वत नहीं होते हैं ?शिक्षा का मतलब केवल जोड़ घटाना नहीं ,केवल डिग्री  ले लेना नहीं, बल्कि, उस स्तर पर बौद्धिक क्षमता का विकास करना है ,जिससे आप अपने आप को शिक्षित कहने का गौरव हासिल कर सके। अपने बोलचाल का स्तर सुधार कर उच्च कर सकें। तत्सम और तद्भव शब्दों में अंतर कर सकें। साहित्य समाज का दर्पण होता है ,यह निर्विवाद सत्य है ।साहित्य मस्तिष्क की खुराक होता है ।चाहे वह धार्मिक साहित्य हो ,या वैज्ञानिक साहित्य हो ,या भौगोलिक या ऐतिहासिक साहित्य हो,  जिस विषय में रुचि हो, वही मस्तिष्क की खुराक होता है ।और मस्तिष्क को उर्वरा करता है। मस्तिष्क की भूख शांत करता है । अतः ये शाश्वत सत्य है कि व्यक्ति के जीवन की उन्नति में बौद्धिक स्तर का हाथ होता है।न कि यंत्र मानव समाज का।क्या हमारा शैक्षिक स्तर बौद्धिक क्षमता को प्रारंभ से विकसित करने का कार्य करता है।शिशु की रुचि के अनुसार उसकी बौद्धिक क्षमता को पल्लवित पुष्पित करता हैं। सीधा जवाब है ,नहीं। ग्रामीण क्षेत्र में बच्चे ककहरा सीख जाएं ,जोड़ घटाना गुणा भाग सीख जाएं ,यही उनकी बौद्धिक स्तर का मानक है ,उन्हें प्रारंभ से लेकर आठवीं कक्षा तक यह करना होता है ।और उसके लिए उन्हें ना तो जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ना तो फेल किया जा सकता है।  शिक्षा कोई घुट्टी तो नहीं है, जिसे  घोल कर पिला दिया जाए और बच्चा पढ़ लिख जाए ।रामचरितमानस में कहा गया है ,और मेरी मां, भी कहती है।करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। इसका मतलब होता है निरंतर अभ्यास से मूर्ख व्यक्ति पढ़ा लिखा हो सकता  है।जब पूरी कक्षा का बौद्धिक स्तर ही मध्यम हो ,निश्चित है ,बच्चों को निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। शिक्षित होने के लिए मात्र शिक्षक का प्रयास ही आवश्यक नहीं है, स्वाध्याय  भी आवश्यक है ।घर का माहौल भी  कलह -क्लेश से दूर ,शांत होना चाहिए। उसमें परिस्थितियों से  सामंजस्य के लिए करुणा होनी चाहिए।वीभत्सता नही स्वच्छता होनी चाहिए। अवसर भुनानेका मौका देना चाहिए।तब बच्चा स्वस्थ शिक्षित बनने की प्रथम सीढ़ी पार करता है ,चरित्र निर्माण के लिए धार्मिक माहौल का होना भी आवश्यक है। जो शिशुओं को भविष्य का मार्गदर्शन कर सक सही गलत की पहचान बता सके। ।उसके विवेक को जागृत कर सके ।  तभी वह शम दम रूपी  काम इंद्रियों व ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण कर   सकता है।सुचिता व स्वच्छता से प्रसन्नता पूर्वक रह सकता है ।सही गलत का चुनाव करते समय दिल की  नही दिमाग की आवश्यकता होती है ।क्योंकि विवेक का निवास उसी में होता है। इंद्रियों पर नियंत्रण भी मस्तिष्क ही करता है। ह्रदय तो आनंद अनुभूति का माध्यम है। भौतिक सुखानुभूति का माध्यम नहीं ।अतः शैक्षिक स्तर की उन्नति के लिए आवश्यक है कि बौद्धिक स्तर की  उन्नति हो ।हमारी शिक्षा का माध्यम जो भी हो, पर उसमें नकल करना अंग बन गया है।जो बच्चे नकल करके पास होते हैं वह कभी मौके पर शक्ल नहीं दिखाया करते। वह पीठ ही दिखाया करते हैं।   वे इसी समाज में अपनी दिनचर्या व्यतीत करते हैं। कौन कितनी मेहनत लगन से पढ़ता है ,सब जग जाहिर होता है ।वे कभी सम्मान के पात्र नहीं होते हैं, ना ही उनका बौद्धिक स्तर प्रतिस्पर्धा के लायक होता है। यही बच्चे कहते फिरते हैं उनके हाथ पैर तो हैं, पर मस्तिष्क नहीं है। इन मूर्धन्यों के पास जब सत्ता आती है ,किसी भी माध्यम से ,धन बल से, या रिश्तेदारों के बल पर या जातिवाद या भाई भतीजा  वाद के माध्यम से ,तो, राजनीति दिशाहीन हो जाती है। क्योंकि, इनके पास कार्य करने की क्षमता, इच्छाशक्ति और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव होता है। और ये कहते हैं, हम तो पैसा कमाने आए हैं, जैसा चलता है चलने दीजिए  ।जीवन में मेहनत से ,लगन से आगे बढ़ने वाला व्यक्ति इन व्यक्तियों के निजी स्वार्थ के  आगे विवश और  पंगु हो जाता है। परिस्थितियों का गुलाम हो जाता है । कुंठा  और दहशत में सादा जीवन उच्च विचार का मूल्य खो देता है। उसके बौद्धिक स्तर का मूल्य केवल नमक दाल रोटी तक ही सीमित हो जाता है। प्रश्न उठता है  हम इस समाज से क्या अपेक्षा करें ?न्याय व्यवस्था दोषी  को जल्द दोषी नहीं ठहरा सकती।  काले कोट वाले अपने आप को तारीख पर तारीख लेकर उपकृत  किया करते हैं। जज बदलते रहते हैं ,प्रक्रिया वही रहती है। निर्दोष तो  तभी दोषी हो जाता है जब वह जेल की सलाखों के भीतर जाता है ,उसका मान सम्मान परिवार  दीन धर्म सब समाप्त हो जाता है ।जब उसे निर्दोष कह कर छोड़ा  जाता है तब बहुत देर हो चुकी होती है। न् न्यायालय  केवल खेद व्यक्त कर सकता है। यह न्याय प्रक्रिया का वास्तविक अंग है, दोषी व्यक्ति, जो पढ़ा लिखा नहीं है ,उसे तरह-तरह की सुविधाएं मिलती हैं।स्वास्थ्य, भौतिक  संसाधनों के अतिरिक्त, शिक्षा की भी सुविधा मिलती है ।एक आतंक का परिचायक शिक्षा को माध्यम बनाकर डिग्री लेने के बहाने खुलेआम समाज में घूमता फिरता है। उसे मालूम है, कि, उसका एक पैर जेल में और एक पैर बाहर है। जेल एक बिना किराए का हॉस्टल है, जिसमें सभी सुविधाएं मानवता के नाम पर वह ले सकता है ।तो यह निर्णय में आप पर छोड़ता हूं की तथाकथित सफेदपोश एवं काले पोश व्यक्तियों के अनुभव से अनुभव से समाज निर्देशित होगा या पढ़े-लिखे संस्कारी, उच्च बौद्धिक स्तर के व्यक्तियों से जिन्हें विवेक और बुद्धि का समावेश  करना आता है। वे दिल को तोड़ा नहीं करते, जोड़ा करते हैं, क्योंकि, उनमें दिव्यानंद रहता है मजबूरी कमजोरी नहीं। वे निर्भय  ,सशक्त होते हैं ।मरने से नहीं डरते ,ना ,कभी पीठ   दिखाते ना ,पीठ पीछे वार करते हैं।लेखक डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

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