मां का उपकार(लघु व्यंग्य कथा)–डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

माँ का उपकार -व्यंग्य कथा

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Praveen Kumar 9:13 AM (7 hours ago)

मां का उपकार- लघु व्यंग्य कथा  एक बहुत पुरानी कहावत है, कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी। कुछ लोग बुरी आदतों को इतना अपना लेते हैं कि, जैसे उनका बुरी लतों से चोली दामन का साथ है। हमारे ही ग्राम में श्यामू व मनोज रहते हैं। दोनों भाई एक दूसरे को जी जान से चाहते हैं एक दूसरे की पसंद इतनी मिलती हैं, कि आदतें भी एक जैसी है ।श्यामू और मनोज को पुड़िया का बहुत शौक है, खाना मिले ना मिले पुड़िया जरूर मुंह में होनी चाहिए। जिसके चलते यह दोनों अपनी फजीहत करवाते रहते हैं ।घर से लेकर बाहर का सारा कार्य मुंह में पुड़िया दबाए ही होता है ।जब कोई बुजुर्ग  आवाज देता है, तो, मुंह खाली करना भी अनावश्यक समझकर जवाब देते हैं। हां बाबू जी! तभी उन्हें जानी पहचानी फटकार पड़ती है,  जा पहले पुड़िया थूक कर आ। पुड़िया मुंह में दबाए ही बोलता है। अच्छा आप ही सोचिए,कि  हुकुम बजाने के बाद भी फटकार पड़ती है। यह अच्छी चीज है क्या ?कभी दोनों जिगरी दोस्त किसी मड़इया में मुंह छुपाए सिगरेट के धुएं के छल्ले उड़ाते हुए दिख जाते हैं। अगर उन्हें कोई पहचान ले, तो, दोनों का हाल ऐसा हो जाता है जैसे धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का। दोनों चिरौरी विनती करते हुए कहने लगते हैं कि ,भैया बाबूजी से मत कहियो, मां से तो कतई मत कहियो। तुम्हें हमारी कसम जॉन बताओ तो हम तुम्हारी सेवा करें।  अब अम्बर भाई रॉब डालकर बड़े भाई के नाते कहते हैं कि अब अगर दोबारा दिखे ,तो ,हम से बुरा कोई ना होगा। दोनों  इस समय हर प्रकार की कसम उठा सकते हैं किंतु,नजर फिरते ही कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी। एक ही नहीं, इस छोटी सी उम्र में उन्हें शराब पीने की भी गंदी लत पड़ गई है। जिसके कारण उन्हे पैसे चुराने की आदत पड़ गई है ।काम से छूटकर वे सीधा हौली के पास ही मंडराते दिखते।  अब तो मां बाबू ने भी कहना छोड़ दिया है ।कहते हैं ,जैसी करनी वैसी भरनी ।पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत को क्या धन संचय ।इतना सब होने के बावजूद दोनों इंसान बहुत अच्छे हैं ।उनका  दिल बड़ा साफ़ है।वह पास पड़ोसियों की मदद में भी पीछे नहीं रहते ,एक बार कुसुम दीदी जो पड़ोस में रहती है ,पेशे से शिक्षिका हैं, के बुजुर्ग चाचा बीमार पड़े ।कुसुम दीदी ने मनोज और श्यामू  बाबू से मदद मांगी ,दोनों ने ,जब सुना ,तो एक टांग पर खड़े होकर चाचा जी की सेवा की ,और उन्हें ठीक कराकर ही दम लिया। कुसुम दीदी तो उनका शुक्रिया अदा करते नहीं थकती । गाहे-बगाहे दिन में एक बार उनकी जुबान पर श्यामू और मनोज का नाम आ ही जाता है। परंतु जैसे ही कुसुम दीदी के चाचा ठीक हुए ,कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी। वह पुनः अपनी पुरानी दिनचर्या में व्यस्त हो गए। मां के तीन बेटे हैं मनोज 18 वर्ष का श्यामू 20 वर्ष का तथा बृजेश 22 वर्ष का।माँ कहते-कहते थक गई है ,पता नहीं पूर्व जन्म  में मैंने कौन से पाप किए थे ,जो इन पापियों से पाला पड़ा ।पता नहीं किसका संस्कार लेकर जन्म लिया है,  हमारी तो सात पीढ़ियों में भी कोई दारू तंबाकू को हाथ नहीं लगाता था। बाकी बच्चे भी तो मेरे हैं, इतना कहते-कहते मां का गला भर आता ।करुणा से उसकी आंखों से आंसू टपकने लगते। इसे देखकर दोनों मां के पास बैठकर धीरज बधांते ,और कहते ,मां हम कहीं नहीं जाएंगे मरते दम तक आपकी सेवा करेंगे पुड़िया और शराब को छुयेंगे भी नहीं ।यह आदत बहुत बुरी है परंतु हम मन के आगे मजबूर हैं। मां हम क्या करें? मां हमें  पीटो मगर हमारी लत छुड़वा दो।माँ हैरान हो दोनों लड़कों की ओर देखती। उन्हें लेकर एक दिन मद्य निषेध केंद्र पहुंचती है। वहां उन दोनों का उपचार होता है ।मां की अच्छी देखभाल प्यार व सहानुभूति के आगे दोनों अभिभूत हैं। और ,अपनी बुराई की लत छोड़कर दोनों को एहसास हो गया है कि उन्होंने नया जन्म लिया है ।उनके जीवन में खुशी उमंग और प्यार का संचार होने लगा है। अब, मां बाबू और भैया सब बड़े खुश हैं ।
डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव कहानी कार

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