“हूँ कवि मैं सरयू -तट का” अ -२—- सुखमंगल सिंह

“हूँ कवि मैं सरयू -तट का” अ -२

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Sukhmangal Singh 9:44 AM (6 hours ago)
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“हूँ कवि मैं सरयू -तट का” 

पृथु बोले ! सुन स्तुति गान 

जो कहता हूँ ,उसे लें मान

 मैं अभी श्रेष्ठ कर्म -समर्थ नहीं

 कि अभी सुनूं मैं कीर्तिगान  

कर्म -सुकर्म -भगत -जगत का              

कवि हूँ मैं सरयू -तट का

यह सुन सूत  आदि सब गायक

हर्षित हो ,मन ही मन नायक

कहे,आप ही देवव्रत नारायण

आप हैं गुणगान के लायक              

प्राकट्य कलावतार हरि -घट का              

कवि हूँ मैं सरयू -तट का

धर्ममार्ग में नित चलकर

निरपराधी को दंड न देंगे

सूर्य किरणें जहां तक होंगी

आपके यश -ध्वज फहरेंगे              

विन्दु न कोई छल – कपट का               

कवि हूँ मैं सरयू -तट का

आपका भू -स्वर्ग -पाताल

दुष्टों को खा जाएगा काल

चमकेंगे जन -जन का भाल

सबके सब होंगे खुशहाल              

भाग्य जागेगा, कूड़े करकट का              

कवि हूँ मैं सरयू -तट का

परब्रह्म का प्राप्ति मार्ग

सनत कुमार जी बताएँगे

सरस्वती -उद्गम स्थल पर

अश्वमेध यज्ञ कराएंगे            

खेती सीचे पानी पुरवट का            

कवि हूँ मैं सरयू -तट का

शिव -अग्रज सनकादि मुनीश्वर

माथे चरणोद चढ़ाएंगे

स्वर्ण सिंहासन पर उन्हें आप

ससम्मान विठाएँगे            

शब्द – अर्थ होगा ,उद्भट का           

कवि हूँ मैं सरयू -तट का

— सुखमंगल सिंह

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