आँखे–संदीप कुमार नर

आँखे

सिर से पाँव तक की गहराई, जान लेती उनकी आँखें
दुनिया में बेमिसाल सी हैं, उनकी आँखें !

क्यों मिलापाता नहीं, ‘मैं’ उनसे अपनी आँखें
खूबसूरती को भी और खूबसूरत बना देती हैं, उनकी आँखें
कैसे मेरे हर विचार को भांप लेती हैं, उनकी आँखें
शायद रातों को जागकर,बनाई होगी, उन्होनें ऐसी आँखें !

सिर से पाँव तक की गहराई, जान लेती उनकी आँखें
दुनिया में बेमिसाल सी हैं, उनकी आँखें !

वो कोई नशा नहीं करते, फिर भी मदहोश हैं, उनकी आँखें
उनकी और देखने का साहस नहीं होता
जब काजल से सजा लेते हैं, ‘वो’ अपनी आँखें !

हर आने जाने पर गहरी निगाहें रखती हैं, उनकी आँखें
दिलकश हो जाती हैं, जब आसमान को देखती हैं, उनकी आँखें !

सिर से पाँव तक की गहराई, जान लेती उनकी आँखें
दुनिया में बेमिसाल सी हैं, उनकी आँखें !

बहाने से गुजरता हूँ, आगे से, ‘कि मेरे को भी देख लें, उनकी आँखें
मैं अकेला दीवाना नहीं, पक्षी तक देखना चाहते हैं, उनकी आँखें
फूल झूमने लगते हैं, जब फूलों को देखती है, उनकी आँखें
विरासत में मिली नहीं, खुद ही निहारी हैं, उन्होंने ऐसी आँखें !

सिर से पाँव तक की गहराई, जान लेती उनकी आँखें
दुनिया में बेमिसाल सी हैं, उनकी आँखें !

लेखक:
संदीप कुमार नर

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