विश्वास–अमरेश सिंह भदौरिया

कहानी

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Amresh Singh 7:12 PM (2 minutes ago)
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                 विश्वास
संध्या का समय था। सावन के महीने का आखिरी दिन था, रह-रह कर बारिश हो रही थी। पुरवाई के झोंके मौसम की अनुकूलता को और अधिक खुशनुमा बना रहे थे। आज कोचिंग क्लास में भी छुट्टी थी। पांडेय सर ने दोपहर में ही फोन पर बता दिया था। अचानक घड़ी पर नज़र पड़ी, शाम के सात बजने वाले थे। मेरा माथा ठनका, अरे!आज तो मेरे मित्र विश्वास का जन्मदिन है। मैंने तुरंत अपना सेलफोन उठाया। उसका लॉक खोलकर कॉन्टेक्ट बुक में से नेहा का मोबाइल नम्बर खोज कर उसको कॉल किया। नेहा के फोन की कॉलरटोन भी सावन के महीने की अनुभूति करा रही थी। शायद किसी फ़िल्म का टाइटल सॉन्ग उसने अपने फोन की कॉलर टोन में लगा रखा था। उसने फोन को रिसीव किया। हैलो! शब्द की सुरीली आवाज़ मेरे कानों में गूंजी, प्रतिउत्तर में मैंने उसे बताया। आज विश्वास का जन्मदिन है। तुम जल्दी से तैयार होकर नुक्कड़ वाली चाय की दुकान पर पहुँचो। वहीँ मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ। मेरे मुहल्ले की गली नम्बर दो में श्याम चाय वाले की दुकान थी। साथ ही एक नीम का पेड़ था।उसकी चाय तो जैसे हम लोगों की कमजोरी बन गयी थी। दिन में अगर उसकी दुकान की चाय न मिले तो जैसे पूरा दिन मन खाली-खाली रहता था।        मैंने अपनी अलमारी से कपड़े निकले और पहनने लगा। माँ को आवाज़ लगायी, कुछ पैसे लेने की फरमाईस की, और जन्मदिन में जाने की इजाज़त भी मांग ली। मैंने जल्दी-जल्दी अपनी पसंदीदा जींस और  टी शर्ट पहनकर कोल्हापुरी सैंडल ढूँढ़ने लगा। आज जूते पहनना मुमकिन नही था, बारिश जो हो रही थी।   माँ को यह बोलकर कि शायद लौटने में कुछ देर हो जाएगी। माँ ने छाता देते हुए कहा बेटा आराम से जाना,और दरवाजा बंद कर लिया। मैं तेज कदमों से चलने लगा। मौसम में हल्की-सी ठण्डक का अहसास हो रहा था। यही कोई पाँच मिनट लगे होंगे कि चाय की दुकान सामने नज़र आयी। वहाँ पहुँचकर मैं नीम के पेड़ के नीचे खड़ा होकर नेहा का वेट(इंतज़ार) करने लगा।बार-बार घड़ी देख रहा था। कस्बे की गलियों में धीरे-धीरे अँधेरा पसरने लगा था। बिजली भी बरसात के महीनों में लुकाछिपी का खेल खेलने लगती है। आज सड़कों पर लोग कम ही नज़र आ रहे थे। हाँ चाय की दुकान पर कुछ दो-चार लोग जरूर चाय की चुस्कियां ले रहे थे। मैंने भी कहा भइया दो चाय मेरे लिए भी अदरक वाली बनाना। मेरी बात पूरी भी नही हुई थी कि सामने नज़र पड़ी तो देखा कि एक हाथ में छाता और एक में मोबाइल फोन, कंधे पर पिंक कलर(गुलाबी रंग)का पर्स लटकाए हुए नेहा चली आ रही थी।    मुझे कुछ राहत मिली। अचानक फिर बरसात होने लगी। अब नीम के नीचे भी पानी टपकने लगा। तब तक नेहा करीब आ गयी। दोनों दुकान के ऊपर बने छज्जे की छाया के नीचे खड़े होकर चाय बनने का इंतज़ार करने लगे। यहाँ भी हवा की बौछार से बचना मुश्किल हो रहा था। घटाएं घिर आयी थी, बिजली चमक रही थी।कभी हल्की और कभी जोर से रह-रह कर पानी बरस रहा था। मौसम का हाल पिछले तीन दिनों से ऐसा ही था।     चाय वाले ने आवाज़ लगायी, भइया आपकी चाय तैयार है। मैंने बढ़कर चाय के दोनों प्याले चाय वाले के हाथ से लेकर एक नेहा को दिया, और एक मैं खुद पीने लगा। चाय रोज की तरह अच्छी बनी थी। नेहा ने आज स्काई(आसमानी)रंग की कुर्ती और काले रंग की जींस पहन रखी थी। नेहा को मैं पिछले चार वर्षों से जानता था। दोनों साथ ही पढ़ते थे। उसका(नेहा का) घर हमारे घर से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर दूसरी गली में था।दोनों की पढ़ाई लगभग ठीक चल रही थी। दोनों अच्छे मित्र थे। दोनों एक दूसरे पर विश्वास भी करने लगे थे। दोनों के घर वाले भी इस मित्रता को जानते थे।        चाय पीते-पीते बारिश कुछ कम हुई, मुझसे पहले जो लोग चाय पी रहे थे वो लोग जा चुके थे। दुकान वाला भी दुकान समेटने लगा था। नेहा ने चाय पीकर कप रखा, और पर्स की तरफ़ हाथ बढ़ाया, मैंने उसे रोकते हुए कहा कि चाय का ऑर्डर(आदेश) मैंने दिया था, अतः पैसा भी मैं ही दूंगा। चाय खत्म कर कप रखा।और पर्स(बटुआ) से कुछ चिल्लर पैसे निकालकर चाय वाले को बढ़ाया। उसने पैसे गिने, और चाय के पैसे लेकर मुझे एक रुपए का सिक्का वापस लौटा दिया।हम दोनों अब सड़क पार कर दूसरी ओर आ गए, और रिक्सा का इंतज़ार करने लगे। काफी देर तक कोई भी रिक्सा नही दिखाई पड़ा। फिर दोनों ने तय किया कि शायद पैदल ही जाना पड़ेगा, दोनों पैदल ही चल दिये।         कुछ दूर चलने के बाद अचानक नेहा रुक गयी मैंने पूछा क्या हुआ? उसने कोई जवाब नही दिया, मुझे कुछ घबराहट-सी होने लगी। मैंने उसका चेहरा देखा तो उसकी आँखों में कुछ डर-सा दिख रहा था। मैंने जोर देकर कहा आखिर तुम्हे आज हो क्या गया है? कुछ कहो तो सही। फिर भी वह कुछ बोल नही सकी। बारिश से दोनों के कपड़े कुछ भीग गए थे। पैरों में कुछ ज्यादा ही पानी का असर था। अब मुझे भी कुछ अज़ीब-सा लग रहा था। अचानक क्या देखता हूँ कि नेहा ने अपने पर्स से कुछ निकाला, और मेरी ओर मुड़कर मेरा हाथ आगे बढ़ाने का इशारा किया। मैं कुछ समझ नही पा रहा था।नेहा ने आगे बढ़कर मेरा दाहिना हाथ अपने बाएं हाथ से पकड़कर उसने दूसरे हाथ से रेशम के दो सुनहले तार मेरी कलाई में लपेट कर बांध दिए। ये क्या? मैं कुछ कह पाता कि उससे पहले ही उसने अपने डर पर विजय पा ली थी। क्योंकि आज रक्षाबंधन था। चार वर्षों से दिलों में बना हुआ विश्वास आज संबंध में तब्दील हो चुका था।आशंका के बादल छट चुके थे, बरसात बन्द हो चुकी थी, आसमान स्वच्छ था, तारे टिमटिमा रहे थे, ज्योत्स्ना की दूधिया रोशनी में पूरा कस्बा (छोटा शहर) नहाया हुआ था, अब हम दोनों डर से मुक्त हो चुके थे, और खुशी-खुशी अपने गंतव्य की ओर चल दिए।
©अमरेश सिंह भदौरिया

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