ये कैसी आस्था–अर्जित मिश्र

ये कैसी आस्था

कल शाम सावन के सोमवार के उपलक्ष्य में शिव दर्शन हेतु डालीगंज, लखनऊ स्थित श्री मनकामेश्वर मंदिर जाना हुआ | सावन का सोमवार होने के कारण भीड़ अत्यधिक थी और बड़ी लम्बी लाइन लगी हुई थी | उस पर से शाम की आरती का समय होने के कारण कपाट बंद थे अतः सब एक ऐसी लाइन में लगे थे जो चल भी नहीं रही थी |

हम भी उसी लाइन में लग गए | अगले दो घंटे एक ही जगह पर खड़े रहने के बाद सूचना मिली की कपाट खुल गए हैं और दर्शन आरम्भ होने वाले हैं | अकस्मात् ही हम सब में उत्साह का संचार हो गया| बम बम भोले और हर हर महादेव के नारों ने आकाश को गुंजायमान कर दिया | हम सभी शिव भक्ति से ओत प्रोत धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे |

यहाँ ये बताना अनिवार्य है की इस उन्मुक्त भीड़ को नियंत्रित करने एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में पुलिस बल शासन द्वारा लगाया गया था | जो लगातार बढ़ती हुई भीड़ को लाइन में लगाने का प्रयास कर रहे थे |

इसी बीच हमारी नज़र कुछ ऐसे लोगों पर पड़ी जो किसी ना किसी प्रकार से लाइन में आगे या मध्य में (जहाँ जुगाड़ बन जाये) लगने का प्रयास कर रहे थे | इनमें से कुछ पुलिस को देखकर कुछ समय के लिए पीछे हट जाते एवं कुछ पुलिस को अपनी कोई मज़बूरी या अपने पद का रौब दिखाकर अर्दब में लेने का प्रयास करते |

एक महाशय अपने को प्रेस से आया हुआ बताकर लाइन में आगे लगने का प्रयास करने लगे, पुलिस अधिकारी के रोके जाने पर पूरी बेशर्मी के साथ प्रेस का रौब झाड़ने लगे | उन्हें कुछ और ऐसे लोगों का साथ भी मिला जो लाइन में आगे लगना चाह रहे थे | किसी ने यहाँ तक कह दिया की मोबाइल से विडियो बनाओ इस पुलिस वाले का जो जनता को परेशान कर रह है| परन्तु वह पुलिस अधिकारी विचलित ना होते हुए उन्हें समझाने का प्रयास करते रहे|

एक महाशय अपने बच्चे को गोद में लेकर आये और कहने लगे की बच्चे छोटे हैं इसलिए हमें आगे जाने दिया जाये| एक महाशय ने कहा की वो सत्तारूढ़ दल के किसी जिले के अध्यक्ष हैं अतः उन्हें आगे जाने दिया जाये | परन्तु वह अधिकारी किसी के दबाव में ना आये एवं लाइन को सुचारू रूप से चलने दिया | हम नमन करते हैं उन पुलिस अधिकारी को जिन्होंने असीम दबाव में भी संयम रखते हुए अपने कर्त्तव्य का पालन किया | यहाँ पर मैं उनका नाम व पद नहीं बताना चाहता क्यूंकि नाम में लोग धर्म व जाति ढूंढ लेते हैं | हमारे लिए वे नाम,धर्म,जाति व पद से ऊपर सिर्फ एक वर्दीधारी अधिकारी हैं जो अपने कर्त्तव्य का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं| हालाँकि वहां कुछ ऐसे अधिकारी भी थे जो सिर्फ खानापूर्ति कर रहे थे एवं अपने मोबाइल में व्यस्त थे| लेकिन ऐसे लोग हर जगह होते हैं एवं इनकी वजह से कर्तव्यनिष्ठ लोगों से उनका सम्मान नही छीना जा सकता जिसके वो अधिकारी हैं|

अब सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि जो लोग अपनी कोई मज़बूरी या अपने पद और पहचान के बल पर लाइन में आगे लगने का प्रयास करते हैं क्या उन्हें वो लोग नहीं दिखाई देते जो घंटों लाइन में लगकर अपनी बारी का इन्तेजार करते हैं| उन्हें वो बच्चे या बुजुर्ग नहीं दिखाई देते जो लाइन में लगे हैं| उन्हें वो महिलाएं नहीं दिखाई देतीं जो लम्बी लाइन में अपने बच्चे को गोद में लिए खड़ी हैं| क्या उन्हें सिर्फ इसलिए इस यातना से गुजरना पड़ेगा (यकीन मानिये लाइन में यदि लोग आपसे आगे लगते जाएँ तो ये किसी यातना से कम नही) की उनकी पहुँच नही है या की वे एक सभ्य नागरिक होने के अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं|

कमोबेश यही हाल भारत के सभी प्रतिष्ठित मंदिरों का है जहाँ महत्वपूर्ण एवं अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लिए अलग दर्शन की व्यवस्था होती है (कुछ जगह पैसे लेकर लाइन में आगे लगाने का धंधा भी चलता है) | और सामान्य भक्त घंटों लाइन में लगकर यातना झेलने को मजबूर होते हैं|

क्या इस प्रकार दूसरों को प्रताड़ित करने वालों को ईश्वर के कोपभाजन का शिकार नहीं होना पड़ेगा? क्या ऐसे लोगों को दर्शन का पुण्य मिलेगा? 

क्या भगवान के दरबार में इस तरह का भेदभाव उचित है? क्या ईश्वर के समक्ष हम सभी अमीर गरीब बराबर नहीं हैं? क्या मंदिरों में सभी के साथ एक समान व्यव्हार नहीं होना चाहिये|

हमारी वर्तमान सरकार VIP संस्कृति को हटाने के लिए प्रतिबद्ध है| जिसके अतर्गत सरकारी गाड़ियों पर लाल लाइट का उपयोग सीमित कर दिया गया |

लेकिन अपने अंतर्मन से इस VIP संस्कृति का समूल नाश हमें स्वयं ही करना होगा|

अर्जित मिश्र

सीतापुर, उत्तर प्रदेश

मो-  9473808236

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