वर्षा –अनुपमा ठाकुर

Hindi kavita varsha

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Anupama Thakur 5:57 PM (54 minutes ago)
to me

वर्षा
मेघ उमड़ -घुमड़ चहूॅ ओर से आए
काले -काले हो मतवाले से मंडराये गड़गड़ाहट की आवाज से आकाश को गुंजाए
पर यह क्या बिना बरसे ही चले जाए इनका तो यह नित्य का क्रम हो गया
क्यों हमसे खिन्न होगया?
जब हमने उनसे यह सवाल किया उन्होंने भी हंसकर जवाब दिया
और पेड़ों को कटवाओ
जनसंख्या भी खूब बढ़ाओ
नए-नए बांध बनाओ
प्रकृति को हर रोज दुखाओ
फिर कैसे पर्यावरण में संतुलन होगा
कैसे सब कुछ सामान्य होगा?
अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार
स्वयं तू क्यों रोता है ?
बिना पेड़ों के वर्षा हो
यह कैसे संभव हो सकता है?
अभी भी वक्त है जाग जाओ
वृक्षारोपण को बढ़ाओ
वृक्षारोपण को बढ़ाओ

अनुपमा ठाकुर

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