धर्मराज की संका— सुखमंगल सिंह ‘मंगल’

धर्मराज की संका

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Sukhmangal Singh Jul 2, 2019, 8:39 PM (13 hours ago)

धर्मराज की संका बढ़ी द्वारिका अर्जुन को भेज श्री कृष्ण का कुशल जानने और करने सबसे भेंट |अर्जुन पाहुचे बेट चिंता तनिक न लेश जब बीता काइयो मास युधिष्ठिर हुटे सचेत काल की विकराल गति देख धर्मराज को अपशगुन आने लगे ऋतु काल भी बदलने लगीं मीठी बोल असत्य लाग्ने लगीं |हर क्रिया की उलटी घातमित्रता कर लोग छ्लने लगे क्रोध बढ्ने लगा अपमपार कपटी होने लगे सबके व्यवहार |पाप पुण्य का होने लगा ब्यापार झगड़ा घर – घर पूरे परिवार प्रकृति अरिष्ट सूचक हुई अपशगुन बढ़ी सभी द्वार |युधिष्ठिर यह सब देखकर कहा भीमसेन कनिष्ठ भ्रातभेजा अर्जुन को द्वारिका पता लगाने कृष्ण का राज |श्री कृष्ण वहाँ क्या कर रहे साथ संबंधियों से मिल आय भाई लौटकर नहीं आए देवर्षि नारद की सच दिखती बात| सात माहदिन  बीत गया लीला विग्रह संबरर्न की रही चाल हृदय ज़ोर से धडक रहा आकाश से होते उल्कापात |सूर्य को मुख कर सियारिन रोतीकुत्ता मुझे देख निडर होय चिल्लात अच्छे पशु मेरे बाएँ से जा रहे और गधे हैं दायें से सब जात |मेरे घोड़े रोते हुये दिखतेबादल मानो खून  रहे बर्षायसूर्य की प्रभा मंद है दिखती भीमसेन तुम व्याघ्र समान पता लगाओ यह सब जाकर विधाता का कैसा फरमान ||- सुखमंगल सिंह ‘मंगल’वाराणसी 

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