समय–महेश रौतेला

समय:तुमने समय को देखा है

नदी की तरह बहता

हजारों मोड़ बनाते हुए

खर-पतवार लाते।

पत्थर की तरह,कठोर होता हुआ।

आँखों की तरह देखता,

घूरताहमारी परिच्छाइयां बनाता,

मिटाताशेर की तरह खूंखार होता।

तुमने समय को प्यार करते देखा होगा,

गरीब की तरह बैठे पाया होगा,

अमीर की तरह सहज देखा होगा,

श्मशान को जाते,कब्रिस्तान पर बैठे,

ऊँची छलांग लगाते देखा होगा।

झाड़ियों, जंगलों के बीच फँसा,

सीमाओं पर नजर गड़ाये,युद्धों में उलझते हुए,

देशों में विभक्त पाया होगा।

सदियां बीताते,भाग्य बनाता-मिटाता, 

कथाओं में आते-जाते देखा होगा,

कहीं नहीं तो हाथ से खिसकते पाया होगा।

*महेश रौतेला

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