चिता—–संदीप कुमार नर

sandeep kumar 6:15 AM (9 hours ago)

   चिता

क्यों अपने तड़फ़ते हैं ,

बातें दिल पर मेरे लगाते हैं।

वक्त क्यों, मेरा जटिल बनाते हैं ,

घूम कर देखी न अभी दुनिया मैंनें ,

घर में ही मेरी कब्र सजाते हैं।

रिश्तेदार पूछते हैं जब मुझे, तू काम क्या करेगा ,

तो मैं कह देता ‘मेरी उदासी में ख़ुशी कौन भरेगा’ ,

मुकाबले की भावना ले , इल्ज़ाम जैसे लगाते हैं ,

मुझे मेरे ही सवाल बड़े तड़फाते हैं।

मिल जाता शायद मुझे कोई उत्तर देने वाला ,

बाग़ीेचे ‘महकते’ जब फूल थे नज़र आते हैं।

धन, दौलत, सब व्यार्थ चीजें ,

अच्छे लोग अपने ईश्वरीय इश्क वाला दर्द सुनाते हैं,

पूछ कर देख लेना कभी उन को ,

वह तो कहेंगे, हमारे से ऊँचा कौन बड़ा महल , कौन बनाते हैं ,

क्यों भूल जाते ने ईश्वर को वह, ‘सन्दीप’,

ईश्वर तो साधारण रह, फंसे बेड़े पार लगाते हैं।

सफ़ेद वेशभूषा डाल कोई ईश्वर नहीं बनता ,

बात वह सुनने का क्या फ़ायदा ,

जो बाद में अलज़बरे सुलझाते हैं।

सुन लेना मेरी बात तू भी गौर के साथ ,

अच्छे भले मनुष्य को, झूठे कुछ लोग, बेईमान बनाते हैं।

मुक्ति संसार में से मिलती तब, जब सामाजिक भलाई के काम कर ,

लोग ईश्वर के बंदे कहलवाते हैं ,

ऊँचा रख जब बंदे को ‘चिता’ में अपने आग लगाते हैं ,

फ़ैसले की इस घड़ी को, शिव जज बन सुनाते हैं ,

हड्डियाँ भी पवित्र हो जातीं हैं ,

जब लाश के अस्त कुदरती पानी में बहाते हैं ,

संत अंत रूह को अपने राहे-राह ले जाते हैं ।

लेखक:

संदीप कुमार नर बलाचौर


लेखक:संदीप कुमार नर बलाचौरLive shayri program ke lye sampark Kare : मो☆9041543692

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