खल के दल में शामिल नभ के सारे तारे–ठाकुर दास ‘सिद्ध’

Thakurdas Siddh

Yesterday at 1:26 PM ·

खल के दल में शामिल नभ के सारे तारे।
बार-बार है होती हिस्से हार हमारे।।
खल के कंठ सुशोभित होती,
बार-बार जयमाल।
सितम सहो चुप रह कर वर्ना,
खिंच जाएगी खाल।।८१।।

बढ़ता निर्धन देख, दिखाने लगें सलाखें।
बड़े-बड़े घर, बड़े घराने, चढ़ती आँखें।।
फूटी आँखों नहीं सुहाते,
जो गुदड़ी के लाल।
सितम सहो चुप रह कर वर्ना,
खिंच जाएगी खाल।।८२।।

माल हमारे पर खल मारा करता पंजा।
निकल न पाता, जिस पर उसने कसा शिकंजा।।
खाली है निर्धन की हंडी,
भरे-भरे भँड़साल।
सितम सहो चुप रह कर वर्ना,
खिंच जाएगी खाल।।८३।।

सब हर लेता, जगह न देता तिल धरने की।
बात-बात में, बात करे है वह जूते की।।
उसके सँग मतवाले गज हैं,
उसके सँग गजपाल।
सितम सहो चुप रह कर वर्ना,
खिंच जाएगी खाल।।८४।।

करते आए, अपने दुख को वे अनदेखा।
उनकी अति का, लिखा रखा सदियों का लेखा।।
व्यथा कथा जन-साधारण की,
चलना है चिर काल।
सितम सहो चुप रह कर वर्ना,
खिंच जाएगी खाल।।८५।।

क्रमशः
– ठाकुर दास ‘सिद्ध’

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