सद्भावना— सुखमनंगल सिंह ‘मंगल ‘

————सद्भावना आधार है ,इस भव्य जीवन धाम का, है शांति इसमें एकता साफल्य लक्षण काम का |यह है पुरातन अति सनातन अभयतन शासवत सही, इसके सहारे ही बनेगी स्वर्ग सी अपनी मही|चाहे जहां भी हम रहें आकाश या पाताल में,यह भूमि है सफला तथा सुजला हरी हर काल में | कालुष्य कटुता द्वेष ईर्ष्या शत्रुता अभिशाप है ,है तामसी ये वृत्तियाँ जो सालती अभिशाप हैं | इससे बचाती हर घड़ी ऐसी तरी सद्भावना ,लेती मिलाती सब गले निर्मूल कर दुर्भावना | है संगठन उत्थान पथ पर आज विघटन हो रहा ,जग जा सही सद्भावना होव मुदित जग रो रहा | ये घर्म कर्म विभेद जितने चार्म शर्म दिखा रहे ,देखें सुधाकर या प्रभाकर ‘मंगल ‘ भाव सीखा रहे || – सुखमनंगल सिंह ‘मंगल ‘ पालीवाल ,वाराणसी 

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