32 मात्रिक छंद “जाग उठो हे वीर जवानों”—बासुदेव अग्रवाल

32 मात्रिक छंद “जाग उठो हे वीर जवानों”
जाग उठो हे वीर जवानों, तुमने अब तक बहुत सहा है।त्यज दो आज नींद ये गहरी, देश तुम्हें ये बुला रहा है।।छोड़ो आलस का अब आँचल, अरि-ऐंठन का कर दो मर्दन।टूटो मृग झुंडों के ऊपर, गर्जन करते केहरि सम बन।।1।।
संकट के घन उमड़ रहे हैं, सकल देश के आज गगन में।व्यापक जोर अराजकता का, फैला भारत के जन-मन में।।घिरा हुआ है आज देश ये, चहुँ दिशि से अरि की सेना से।नीति युद्ध की टपक रही है, आज पड़ौसी के नैना से।।2।।
भूल गयी है उन्नति का पथ, इधर इसी की सब सन्ताने।भटक गयी है सत्य डगर से, स्वारथ के वे पहने बाने।।दीवारों में सेंध लगाये, वे मिल कर अपने ही घर की।धर्म कर्म अपना बिसरा कर, ठोकर खाय रही दर दर की।।3।।
आज चला जा रहा देश ये, अवनति के गड्ढे में गहरे।विस्तृत नभ मंडल में इसके, पतन पताका भारी फहरे।।त्राहि त्राहि अति घोर मची है, आज देश के हर कोने में।पड़ी हुयी सारी जनता है, अंधी हो रोने धोने में।।4।।
अब तो जाग जवानों जाओ, तुम अदम्य साहस उर में धर।काली बन रिपु के सीने का, शोणित पी लो अंजलि भर भर।।सकल विश्व को तुम दिखलादो, शेखर, भगत सिंह सा बन कर।वीरों की यह पावन भू है, वीर सदा इस के हैं सहचर।।5।।
बन पटेल, गांधी, सुभाष तुम, भारत भू का मान बढ़ाओ।देश जाति अरु राष्ट्र-धर्म हित, प्राणों की बलि आज चढ़ाओ।।मोहन बन कर के जन जन को, तुम गीता का पाठ पढ़ाओ।भूले भटके राही को मिल, सत्य सनातन राह दिखाओ।।6।।
बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’तिनसुकिया

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