// अंत में //—विश्वनाथ शिरढोणकर

Vishwanath Shirdhonkar

// अंत में //
——
दिनभर तो चहकते हैं
शाम को उड़ जाते हैं
इस पेड़ पर घरोंदा नहीं !!

दरवाजा है , झरोख़ा है
धूप है , हवा भी है
इस घर में इन्सां नहीं !!

कितनी बार जकड़ लिया
मन हमेशा भाग जाता है
इस घर में दरवाजा नहीं !!

कितनी बार ऊंचाई पर पहुंचा
बार बार निचे गिरता है
किसी मक़ाम पर ठहरता नहीं !!

कहने को कुछ नहीं
देने को तो कुछ भी नहीं
इस आकाश में नक्षत्र नहीं !!

क्या कमाया क्या बचा ?
और कितनी बची जिंदगी ?
यहाँ किसी को पता नहीं !!

सुन कर सब बहरे बनों
देख कर सब खामोश रहों
इस मुँह में ज़ुबान नहीं !!
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विश्वनाथ शिरढोणकर ,इंदौर ,म. प्र .

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