काश! मैं होता सांसद–हेमेन्द्र क्षीरसागर

 काश! मैं होता सांसद

(हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक)

      काश! मैं होता सांसद यह प्रश्न बार-बार मेरे जेहन में कौंधकर रहा है कि मुझे अब सांसद बनने जनता की अदालत में जाना चाहिए। इसलिए की मेरे सांसद ने मुझे, क्षेत्र और मूल्क को धोखा देकर विकास व समृद्धि को रोका है। यहां तक कि झोली में आई सांसद निधी मुंह दिखाई के नाम पर रेवड़ियों की तरह बांटी गई वह भी आधी-अधूरी। भेड़चाल इनकी मौजूदगी के कोई मयाने नहीं रहे, रवानगी ही समय की मांग और आवश्यकता है। विपद ये ज्यादा देर टीके रहे तो बचा-कचा भी बेड़ागर्ग हो जाएगा। दुर्भाग्यवश! असलियत कहें या हकीकत अधिकतर सांसदों के आलम यही है। बतौर इनके प्रति बढ़ता जनाक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है मद्देनजर नकारों को नकारने मुस्तैदी से बदलाव की बयार लाना ही एकमेव विकल्प है।

      संकल्प, जरूरत पड़ी तो लोकशाही के मैदान में उतरना भी पड़े तो जिम्मेदारी से मुंह नहीं फेरेंगे बल्कि जमकर मुकाबला करेंगे। महासमर में मैं कमर कसकर  खड़ा हूँ, क्यां आप भी तैयार है। याद रहें बागडोर अपने कांधों में लेकर ही व्यवस्था सुधारी जा सकती है। मत और ज्ञान दान से ही नहीं, उसका दौर खत्म सा होते चला। यथा बिना वक्त गवाये संसद का रास्ता अख्तियार करने जुट जाए। भागीदारी मूलक हम सांसद का मूलाधार प्राचीन, विशाल और जनतांत्रिक संसदीय प्रणाली को अक्षुण्ण रखने में मददगार साबित होगा।

      बहरहाल चलिए, बधाई हो 16 वीं लोकसभा का पूर्ण कालिन पंचवर्षीय कार्यकाल बे-रोकटोक समाप्त हुआ। अब कुछ ही दिनों में 17 वीं लोकसभा के लिए हमें फिर से मतदान करना होगा। वह भी सौ टका, तब जाकर एक मनवांछित बहुमती सरकार जनता की पहरेदार बनेगी। अन्यथा मतलबी अयारों की बैसाखी पर बैठी अल्पमति सरकार के दुखड़े जनआकांक्षाओं के टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ेंगी। जैसा हम कई मर्तबा देखते और भोगते आए है, विभीषिका विकसीत भारत का सपना आज भी अधूरा ही है।  शुक्र है निवृतमान में ऐसा नहीं हुआ फलीभूत जनमत सलामत रहा।

    . मतलब, स्पष्टतौर पर कहा जा सकता है कि वतन की तरक्की में स्थाई सरकारों की खासी दरकार है। जिसमें हमारे सांसदों की विशेष भूमिका रही है लेकिन इनमें से बहुतों ने इसे अदा करने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। नाफरमानी पदलोलुप्ता व सत्ता-सुख की लालसा में अपने स्वार्थ को साधा जिसकी सजा आमजन को मिली। लिहाजा ऐसे नुमांईदों से बचाव ही एक रास्ता है, राहबर आगामी लोकसभा में ऐसे सांसदों का चुनाव करे जो अपने लिए कम देश के बारे में अधिक सोचे। ताकि देश में और एक बार स्थिर सरकार सफलता के झंडे गाड़े क्योंकि ढूलमूल गठबंधन में बे-मेल, दलों का दलदल रसातल के सिवाय और कुछ नहीं है।

     सचेत इसके वास्ते हमें बढ़ी सजगता से सदन में सांसद भेजने की जिम्मेवारी मन से निभानी पड़ेगी। रवैया पवित्र संसद को नीर-क्षीर बनाकर गुलेगुलजार करेगा। महफूज मुश्किलों के दौर में निष्ठी सांसद कहां से ढूंढेंगे या चुनेंगे ये बहुत बड़ी चुनौती बनेगी। रवायत दर्द का मर्ज हमारे हाथ में है जरूरत है तो इस्तमाल करने की। वह हर हाल में अब करना ही होगा वरना हमारी विशाल राष्ट्रवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नेस्तनाबूत होते देर नहीं लगेगी। अफसोस जनक हालातों से वाकिफ सांसद जिम्मेदारी लेने के बजाए बढ़ावा देने पर तुले हुए है।

     अलबत्ता निष्क्रिय, ठगियों को बॉय-बॉय और सक्रिय, उपयोगियों को हाय-हाय करने की बारी अब हमारी है। नहीं करेंगे तो समझिए आने वाली पुश्तें हमें कदापि माफी नहीं करेंगी । बेहतरतीब, बेलगाम व्यवस्था और दुशवारियों के कारक हमीं बने रहेंगे। मिथक को तोड़ते हुए मनपसंद की जगह हर पसंद के सांसद को नुमाईंदगी का मौका मिले येही देश के खातिर हितकारी होगा। आखिर संसद में सांसद देश का भविष्य लिखते है उन पर पैनी नजर रखना हम सबका नैतिक कर्तव्य व दायित्व है। अमलीजामा खुले-सच्चे मन से निरीही और निस्पृही सांसद बनकर या बनाकर काश! मैं होता सांसद आत्मोन्नति की मनोवृति परिवर्तित होकर सांसद-सांसद का घनघोर गुंजार करेंगी। बेहतर बे-पटरी होते जनतांत्रिक आधार स्तंभ चुस्त-दुरूस्त होने लगेंगे। यथेष्ठ एक राष्ट्र, श्रेष्ट्र राष्ट्र सदा सर्वदा बना रहेगा।

(हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक)
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हेमेन्द्र क्षीरसागर,

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