आसमान—Anil Sharma

Anil Sharma Wed, Mar 13, 1:04 PM (1 day ago)

आसमान————मैने पूर्ण निष्ठा से तुमको अपना आसमान समझातुम अपनी धरती का दर्जा भी न दे सके मुझेमुझे मिट्टी समझ खेलते रहेऔर उस मिट्टी से मैं गढ़ती रही खिलौनेअपनी कोख के साँचे मेंतुम्हारे खेलने के लिये और तुम खेलते रहे मेरे अस्तित्व के साथ
फिर भी मैने जीतने दिया इस खेल में तुमको खुद को हरा करजबकि तुम हमेशा ही हारते रहे हो मुझसे धरती पर होकर मेरी नज़र खेल पर कम ,अपने आसमान पर ही अधिक रही अपने आसमान को ऊँचाई पर देखना गौरवान्वित करता रहा मुझे अपने आसमान की हार क़बूल नहीं थी नारी को सात फेरों के बंधन बॉंध कर कितना आज़ाद हो जाता है आदमी कुछ भी ग़लत करने के लिये स्वतन्त्र ,अपमुराण कहींकामेरी निष्ठा को मेरे जीवन को खेल बना दिया तुम खेले मेरे अलावा,दूसरी खिलाड़ी के साथ भी  ?लानत हैमैं टीस लिये ख़ामोशी से तुम्हारा धोखे का खेल देखती रहीअफ़सोस करती रही उस आसमान की हार पर जो मेरा होकर भी अब मेरा नहींजिस फ़रेब को वह जीत समझ रहा है वही जीत उसकी पराजय का बिगुल है 
अनिल कुमार शर्मा941258822613-2-19

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