“शिक्षा:-एक व्यवसायिक साधन”

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Shivankit Tiwari 1:32 PM (4 hours ago)

मन व्यथित है आज बड़ी असहनीय वेदना हो रही है आज की इस गर्त में जा रही आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को देखकर,आज शिक्षा को सिर्फ पैसों से तोला जा रहा है मतलब यहाँ तक शिक्षा की दयनीयता देखने को मिल रही हैं की जैसे बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान सिर्फ पैसों के लिये ही खोले गयें है और शिक्षा को व्यवसाय का माध्यम बनाने के लिए पूरी तरह से संकल्पित हैं ।आर्थिक तौर पर अगर कोई कमजोर है और वह बड़े शिक्षण संस्थान पर प्रवेश पा जाता हैं और समय पर वह अगर शिक्षण संस्थानों के शुल्क की अदायगी नहीं कर पाता तो उसे इतना परेशान किया जाता हैं की वह मानसिक व्याधियों से ग्रसित हो जाता हैं।उसकी क्या परेशानी है वह किन परिस्थितयों से गुजर रहा है,उसकी आर्थिक स्थिति का स्रोत सुदृढ़ है या कमज़ोर है,उससे उन्हें किसी प्रकार का कोई लेना देना नहीं है,उसकी एक नहीं सुनी जाती उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है क्योंकि उन्होंने सिर्फ और सिर्फ पैसों की आवक के लिये ही शिक्षा को जरिया बनाया हैं,एक सशक्त हथकण्डे के रूप में शिक्षा को पूरी तरह से अपनाया है।ये लचर शिक्षा प्रणाली के चलते अक्सर मध्यम वर्गीय परिवारों से ताल्लुकात रखनें वाले बच्चे जो उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश तो पा जाते है लेकिन उनको शिक्षण शुल्क जमा करने के लिए किस हद तक परेशान किया जाता हैं उनका मानसिक शोषण किया जाता हैं और उनके साथ अभद्रतापूर्वक व्यवहार किया जाता है जिससे वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता हैं और उसके और उसके परिवार वालों के सारे सपनों का अन्त हो जाता हैं।शिक्षा जो की इस दुनिया का सबसे सशक्त और प्रभावशाली हथियार और शिक्षित होना हर मानव का जन्मसिद्ध अधिकार हैं।भारत देश की प्रथा के अनुसार घर में बच्चों की किलकारियां गूंजते ही उसके माता-पिता कह देते हैं की मेरा बेटा बड़ा होकर डॉक्टर/इन्जीनियर बनेगा और अन्ततः वह इस बात पर अडिग रहते हैं लेकिन जब बेटे को शिक्षण संस्थानों में प्रवेश मिल जाता है तो बस एक ही बात की समस्या आती हैं की इतनी सारी शुल्क की अदायगी वह एक साथ कैसे करें क्योंकि प्रवेश पाने वाले बच्चों में से कुछ बच्चों के पिता किसान या फिर छोटे व्यवसायी या फिर उनकी आय का स्तोत्र बहुत कम होता हैं जिससे वह समय पर शुल्क नहीं दे पाते जिसकी वजह से होने वाली  तकलीफ उनके बच्चे भुगतते हैं और जब वह मानसिक प्रताड़ना को बर्दाश्त नहीं कर पाते तो वह आखिरी रास्ता के रूप में आत्महत्या या आतंकवाद को चुनते है जिससे उनके माता-पिता के सारे सपनों की बलि चढ़ जाती हैं। 
सबके माता-पिता का एक ही सपना होता है की उसका बेटा/बेटी एक दिन उनके सपनों पे खरा उतर कर समाज में मेरा नाम बहुत ऊँचा करें।लेकिन ये शिक्षा के माफियों का दिल भी नहीं पसीजता की उसको क्या परेशानी है उसको तो बस कुर्सी पे बैठ हुकूमत चलाना है और उसने हुकुम कर दिया की शिक्षण शुल्क चाहिये तो बस चाहिये अब सामने वाले को इतना विवश किया जाता हैं कि उसके पास कोई विकल्प ही नहीं बचता शिवाय आत्महत्या के।
आज शिक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता सिर्फ पैसे पर निर्भर करती है मध्यम वर्गीय परिवार वालों का न कोई शिक्षण संस्थान साथ देता न कोई सरकार।उच्च और निजी शिक्षण संस्थान सिर्फ और पैसों के लिये बनाये गयें जिनका मुख्य उद्देश्य शैक्षिक व्यवसाय करना हैं,न उन्हें शिक्षा की गुणवत्ता से मतलब हैं न उन्हें छात्रों के भविष्य से क्योंकि उनकी कई पीढियों के लिये ये शिक्षा बहुत बड़ा व्यवसाय और आय का साधन हो गया हैं।बस आखिरी बात की अगर आपके अन्दर थोड़ी सी भी मानवीयता जिंदा हैं चाहें आपने कितना भी बड़ा शैक्षणिक संस्थान चला रहे हो आपका सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता को बरकरार रखना होना चाहिये और शिक्षा को व्यवसाय न समझ कर आपको शिक्षा को मजबूती प्रदान करना चाहिये जिससे आनें वाले समय में शैक्षणिक गुणवत्ता में वृद्धि हो,आप शिक्षा की नींव को सशक्त करें तभी किसी के सपनें रूपी महल तैयार हो सकेगें और शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत सफलता मिलेगी लोंगो का विश्वास शिक्षण संस्थानों और शिक्षा के प्रति बरकरार रहेगा।
-©शिवांकित तिवारी “शिवा”
   युवा कवि एवं लेखक      सतना (म.प्र.)   सम्पर्क नम्बर:-9340411563

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