लघुकथा: एवमस्तु कैसे हो चुन्नीलाल–डां. नन्द लाल भारती

Nandlal Bharati Sun, Mar 10, 10:57 AM (1 day ago)

लघुकथा: एवमस्तुकैसे हो चुन्नीलाल रघुनंदन जी पूछे ….. ?बस जीवित लाश ढो रहा हूँ ।चुन्नीलाल क्या कह रहे हो कैसी लाश…. ….?खुद की लाश मृत अरमानों की लाश ।क्यों दर्द के समन्दर मे डूबे पड़े हो ?बाबू जिसका बेटा पत्नी के मोहफांश और सास-ससूर की अंधभक्ति में मां बाप को सौतेला साबित कर दे ।मां बाप का परित्याग कर दे। वही मां बाप जिस बेटे का भविष्य संवारने के लिए पानी पीकर जीये पर बेटे को हर तकलीफ़ से बचाकर रखे।उसी बेटे को उसके सास ससूर लूट रहे हैं तो ऐसे मां बाप की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हो रघुनंदन ।बेटी के रिश्ते की आड़ मे बेटी के मां बाप ने तुम्हारे सपनों की दुनिया का जनाजा निकाल दिया रघुनंदन बोले।मन्नीलाल अपना मौन तोड़ते हुए बोले चुन्नीलाल के समधी-समधन को हजार गुना दर्द तो मिलेगा ही पर उनके वारिस भी इस प्रकोप से सात पीढियों तक नहीं उबर पायेंगे।ऐसा श्राप न दो,तुम तो दुआ करो मेरे बच्चो को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की मिले,बड़ी उम्र मिले, सदा स्वस्थ और खुशहाल रहे । परमार्थ का कार्य करें परमात्मा सद्बुद्धि दें ।चुन्नीलाल बोले ।एवमस्तु………… रघुनंदन बोले । डां. नन्द लाल भारती09/03/2019

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