स्मृति तुम्हारी (नवगीत)– सुशील शर्मा

sushil Sharma 10:38 AM (10 minutes ago)
to me

स्मृति तुम्हारी
नवगीत
सुशील शर्मा

कसक रही स्मृति तुम्हारी
हृदय विरह में जीता है।

स्फुट कलियों की मंशा में
काटों का काठिन्य मिला।
पुलक प्रणय की अभिलाषा में ,
विरह नागफन आज खिला।

मुड़-मुड़ कर
पथ देखा तेरा
दूर तलक सब रीता है।

अनगिन विरह की घड़ियाँ भोगीं
पर्वत पीर किनारे थे।
पीड़ा के घूँघट से झाँका
तुम न कभी हमारे थे।

हृदय लिए अवलम्बन तेरा
झूठी आस पे जीता है।

बिखरा है ऋतुराज वसंती
मन में गहन अँधेरे हैं।
बाहर खिलते सुमन वृन्त हैं
अंतस मरुथल डेरे हैं।

मुखर वेदना मौन हुई है ,
हृदय गरल अब पीता है।

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