मुझे काकी की याद आई—Vishwanath Shirdhonkar‎

-मुझे काकी की याद आई । याद आया कि ग्वालियर में एक बार किसी विषय के निकलने पर काकी ने नानाजी से कहा था , ‘ दामादजी , ऐसे हार मान कर मत बैठो । जुआ न खेलते हुए भी आप सब कुछ हार कर बैठों हो यह सोच ही गलत है । सच तो यह है कि हारने के लिए जुआ ही खेलने की जरुरत नहीं होती । जिन्दगी भी एक जुगार ही है । अब मुझे ही देखिए। मैं क्या जुआ खेलती हूं ? फिर भी आवडे के पिता को , आवडे को , और अक्का को हार ही बैठी ना ? मेरा तो यही सब कुछ था। और जब मेरी शादी हुई तब मुझे यह कहां मालूम था कि मैं आवडे को जन्म दूंगी , आवडे अक्का को जन्म देगी और यही सब कुछ मेरा भी सर्वस्व बन जाएगा। मुझे तो यह भी कहां मालूम था कि पहले मैं अपने पति को हार बैठूंगी , बाद में अपनी बेटी को और बाद में अपनी लाडली नाती को भी ।अब किस के सहारे जिऊं ? सच तो यह हैं कि अनिश्चितताओं का खेल ही तो हैं जिन्दगी। खिलाने वाले भी रामजी , जिताने वाले भी रामजी और बाजी पलटने वाले भी रामजी । हम चाहे पैसों के साथ खेले , आदमियों के साथ खेले , भावनाओं के साथ खेले , या समय के साथ खेले , ज्यादा हुआ तो ताश के पत्तों के साथ खेले।अनिश्चितता हमारा पीछा नहीं छोडती । दामादजी , मैं तो कहती हूं हमें अनिश्चितताओं के साथ भी अभ्यस्त हो जाना चाहिए तभी हम परिथितयों को मात दे कर संकटों का सामना कर सकते है।’

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