‘वोट’ —कश्मीर सिंह

kashmir Thakur

10:33 AM (6 hours ago)
कविता
             ‘वोट’
देश का चुनावी दौर
करता है शोर
शामिल होता है
हर किस्म का नेता
कोई होता है
 घिसता पिसता ईमानदार
कोई लोमड सा चलाक चोर
पाट्री विशेष की चलती लहर
पाट्री टिकटों की बोलियां होती
हर हलके के निवासियों के
 मानसिक स्वाद मापे जाते
गाढी कमाई  के लिए बनती
कार्याकर्ताओं की फौज
ज्यों ही जीते इनकी पाट्री
चलती इनकी तूती
होती इनकी मौज
ये सियासत है साहब
ये जिंदा नागरिकों का दर्द नहीं समझ सकती
तो अपनों की लाशों पर बिलखतों की इन्हे क्या परवाह
इसलिए कहे कश्मीर कविराय
सातिरों को देनी हो करारी चोट
तो सोच समझ कर देना
 अपना अनमोल वोट
कश्मीर सिंह
रजेरा चम्बा

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