नानाजी —Vishwanath Shirdhonkar

मैंने देखा नानाजी के सामने एक आदमी खड़ा था।नानाजी को देखते ही वह भी रुक गया था। उस आदमी ने सडक पर ही नानाजी को झुक कर नमस्कार किया। नानाजी कुछ पल के लिए उसे आश्चर्य के साथ देखते ही रहे। फिर उनके मुंह से निकला , ‘ अरे दामाद जी आप . कब आये उज्जैन से ?’-‘ कल शाम को। और ये कौन है ? ‘ उस आदमी ने मेरी ओर देख कर पूछा। -‘अरे क्या दामादजी ? ये आपका ही बेटा है। ‘ नानाजी हंसते हुए बोले। -वह आदमी थोडा लज्जित सा हुआ। बोला , ‘ ओह ! मुझे लगा गोपाल है । ‘ – ‘ कोई बात नहीं। रहने दीजिये।गोपाल तो कानपूर में है।और कैसे चल रहा है उज्जैन में। घर में सब का स्वास्थ कैसा है ? ‘ नानाजी ने पूछा । झक्क सफ़ेद पेंट और
चमकदार सफेद बुशर्ट पहने , काले रंग का सुन्दर गॉगल चढ़ाये , काले चमकदार चमड़े के जूते पहने , एक आदमी नानाजी के सामने खड़ा था और नानाजी उसे अपना दामाद कह रहे थे । उज्जैन की भी चर्चा हुई । इतना ही नहीं नानाजी मुझे उसका बेटा बता रहे थे । तो यही आदमी हैं मेरा पिता -मैं नानाजी के पीछे खडा था । मैंने देखा एक सांवला सा आदमी नानाजी के सामने खड़ा था , और काकी जिसे मेरा पंढरी कह रही थी वह भी यही आदमी है । अब ये आदमी सच में मेरा पिता है । मुझे बहुत अच्छा लगा । मैं आनंदित भी हुआ ।-जरा ठहरिये । अब वह आदमी मेरा पिता है । उसको अरेतुरे और इकहरे नाम से संबोधन करना अच्छा नहीं । मैं अपने पिता को पहली बार देख कर थोडा लजाकर संकोचवश नानाजी के और पीछे होकर मेरे पिता को कनखियों से देखने लगा । ये पता पड़ने के बाद भी कि मैं उनका पुत्र हूं उनका मेरी ओर कतई ध्यान नहीं था । वें थोड़ी देर नानाजी के साथ बोलते रहे और बिना मेरी ओर देखे , बिना मुझसे बोले अचानक वहां से चले गए । पिता पुत्र का संवाद नहीं हो पाया । मेरे पिता मुझसे पहली बार मिलने के बाद भी , बिना मुझसे बोले , बिना मेरी ओर देखें ऐसे कैसे जा सकते है ?इसका मुझे आश्चर्य हुआ । मुझे घोर निराशा भी हुई और मैं दु:खी भी हो गया । -‘भैय्या , यहीं मेरे दादा थे क्या ? ‘ मैंने नानाजी से पूछा । – ‘ हाँ । ‘ – फिर वों बिना मुझसे बोले , बिना मेरी और देखे इस तरह अचानक क्यों चले गए ?’ -‘ वें थोड़े जल्दी में थे । तुम्हारे दादाजी विष्णुपंतजी की तबियत बहुत खराब है । इसीलिए उनको उज्जैन से अचानक आना पड़ा । अभी वें तुम्हारे फूफाजी वैद्यजी को बुलाने ही उनके घर जा रहे है । उन्होंने कहां है वें तुमसे बाद में घर आकर मिलेंगे ।’- नानाजी ने कहां जरुर पर उनके जवाब से मेरा समाधान नहीं हुआ . मेरे सारे उत्साह पर पानी सा फिर गया था .
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