मुझे लखनऊ मेडिकल कॉलेज जाना है–अनुराग ‘अतुल

आज सुबह 9 बजे सीतापुर से लखनऊ का सफ़र , तेज सर्द हवाएँ, बारिश के पूरे आसार।
मैं बस की लगभग आखिरी सीट पर बैठा हुआ हूँ ,मुझे लखनऊ मेडिकल कॉलेज जाना है।

फेसबुक खोलकर देखा , सारी कल के आतंकी धमाके की पोस्ट , फोटो ..मैं अपनी कमजोरी आप सबको बता देता हूँ कि मैं इस मामले में थोड़ा कमज़ोर आदमी हूँ देर तक ऐसी तस्वीरें नहीं देख पाता, मन घबड़ाने लगता है और कई बार इस मुद्दे को लेकर एकांत में स्वयं को ज़लील भी करता हूँ!
लेकिन आज जिस बात को याद करके मैं सबसे ज़्यादा व्यथित हो रहा हूँ, वो किसी के लिये एक आम बात हो सकती है, लेकिन मेरे आँसू उस बात को सोचकर बार बार आँखों से निकलना चाहते हैं और मैं अपनी पूरी शक्ति से रोक रहा हूँ!

दरअसल , कल शाम जब मैं अपने घर वापस पहुंचा तो मुझे उस घटना की जानकारी नहीं थी और मेरे गले में बहुत दर्द हो रहा था (लगभग 10 वर्षों से कण्ठ में कई गिल्टियां हो गईं हैं जो कभी कभी सूजन और दर्द से मुझे परेशान कर देती हैं ज़िन्दगी की ज़द्दोज़हद में सही से उपचार भी नहीं कर पाया और इस कारण कई बार पढ़ाते हुए या कविता के मंच पर चुनौती का सामना भी करना पड़ता है) मैंने घर में देखा सब टीवी देख रहे थे , मैं माँ के पास गया बोला , मम्मी गले में दर्द बढ़ रहा है कल दिखाने जाना पड़ेगा, बहुत परेशान हूँ क्या करूँ , कुछ समझ नहीं आ रहा।
मां कुछ बोलती कि इससे पहले बहन ने कहा- “भाई , ज़रा सा गिल्टियों में दर्द हो रहा है तो इतने परेशान हो और इन सैनिकों को देखो (टीवी की और इशारा करते हुए) जिनके चिथड़े उड़ गए देश की सुरक्षा में , बेचारे घर वालों को लाश भी नहीं मिलेगी !” ‘क्या’ की आवाज़ के साथ मेरा मुँह खुला रह गया , मैं स्तब्ध था, निःशब्द हो गया था फिर बड़ी देर तक चुपचाप बैठे हम लोग न्यूज़ देखते रहे।

आज बहन का वो एक वाक्य मेरे मानस को मथ रहा है, मन हो रहा है किसी के गले लगकर ज़ोर ज़ोर से रो लूँ , पर मैं इस दुःख को ख़त्म नही करना चाहता , रोकर दुःख कम करना सबसे आसान है । सफ़र में कई बार ऐसा लग रहा है कि उल्टी हो जायेगी, हल्के फुल्के चक्कर भी आ रहे हैं, बीपी लो-हाई हो रहा है, हर भारतीय की तरह विचारों, भावनाओं , संवेदनाओं का ज्वार उफान पर है..प्राण कण्ठ में आ रहे हैं।

लेकिन मैं सोचता हूँ क्या लोग सचमुच दुखी हैं कि इन सीआरपीएफ के जवानों ने हमारे देश की, हमारी सुरक्षा के लिये अपना सब कुछ लुटा दिया, मरने वाला भी अपना शरीर छोड़कर जाता है अपने परिवार वालों के लिये, पर वो तो भी दे गए , हाँथ, पाँव ,मस्तक ,पेट ,रक्त ,अस्थि , मज्जा , वर्दी और बन्दूक सब एक में मिलाकर मिट्टी में मिल गए …पूरी दुनिया मे भला इससे बड़ी भी कोई शहादत हो सकती है..!

अगर हम सचमुच दुखी होते तो जिस देश के लिये सैनिकों ने अपने चिथड़े उड़ा दिये

-उस देश में इतने लाख लोग दो जून की रोटी के सपने देखते हुए भूखे नहीं सोते!

-उस देश मे इतने बेसहारा लोग फुटपाथ पर जाड़े की राते नही बिताते।

-उस देश के राजनेता इतनी गिरी , झूठी और स्वार्थपूर्ण राजनीति नहीं करते।

-उस देश में अस्पतालों के डॉक्टर बिना रुपये लिये किसी मरीज का ऑपरेशन न करके उसकी जान नहीं लेते और कभी पेट में तौलिया तो कभी कैंची नहीं छोड़ते ।

-उस देश के सरकारी अध्यापक जनता के टैक्स के पैसे से अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाकर देश के गरीब बच्चों का भविष्य नही बर्बाद करते , अंग्रेज भी यही करते थे।

-उस देश में किसान एक इंच मेढ़ काटने के लिये एक दूसरे का फावड़े से सिर नहीं काटते।

-उस देश के स्वनाम धन्य महाकवि अपने छोटों के सिर पर पैर रखकर आगे नही बढ़ते और मां सरस्वती की वन्दना करने वाली अनगढ़ कवयित्री नए नए भांड-कवियों के साथ बीच कार्यक्रम से न निकलती।

-उस देश मे उन शहीदों की चिता में आग लगने से पहले ही 1000 पर खरीदे गए it cell के लड़के किसी आतंकी के सर पर किसी राजनेता का सर लगाकर राजनीति की रोटियां नही तैयार कर रहे होते।

-उस देश में आदमी आदमी का दुश्मन नहीं होता अगर उसे यह अहसास होता कि हमारी सुरक्षा के लिये किसी ने अपने चिथड़े उड़वा दिए हैं।

-लेकिन फिर भी बहुत लोग हैं जिनकी संवेदनायें उछाल मार रही हैं और वो ये दृश्य देखकर उसी तरह से रो रहे हैं जैसे किसी का बाप मर गया हो।

मैं जानता हूँ ये सरकार के साथ खड़े होने का समय है लेकिन क्या ये सवाल नही पूछा जाना चाहिये कि इन जवानों की सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम क्यों नहीं किये गए जबकि हमले की धमकी 5 तारीख को मिल चुकी थी।
हमारी इंटेलिजेंस ब्यूरो इसकी सूचना देने में पिछली बार की तरह फिर नाकाम क्यों रही?
अगर सरकार के पास इस सुरक्षा व्यवस्था के लिये पैसों की कमी है तो हिंदुस्तान की जनता का बहुत बड़ा भाग है जो इस कार्य मे अपना सहयोग देने के लिये तैयार बैठा है।

क्या इस दलाल मीडिया के एक बहुत बड़े तबके से यह सवाल नही पूछा जाना चाहिये कि 13 दिसम्बर को जब यही जवान अपनी माँगों को लेकर जंतर मंतर पर बैठे थे तो इन्होंने कितनी ख़बर चलाई थी ?
यही तो मांग रहे थे कि हमें भी पूर्ण सैनिक का दर्जा मिले, पेंशन मिले , डिस्पेंसरी की सुविधा मिले और कैंटीन में छूट मिले।

-बदला जरूर लेना चाहिये , सर्जिकल स्ट्राइक होनी चाहिये , लेकिन चिल्लाने या गुस्सा से समाधान नहीं निकलने वाला, ये भी हमें समझना पड़ेगा , ये आतंकी मरने से डरते होते तो शायद सही आदमी बनकर कोई दूसरा काम करते, हम कुछ भी कर लें इतने सैनिको की वापस नही लौटा सकते ।
क्या दुनिया के बाकी देश आपको युद्ध करने देंगे जबकि दोनों देश आण्विक शक्ति सम्पन्न हैं आज युद्ध का मतलब विश्व युद्ध है।
सबसे जरूरी बात है कि सुरक्षा में जहां चूक हो रही है उस व्यवस्था को बहुत अच्छी तरीके से प्रबंधित किया जाए, उसके लिए चाहे जो भी करना पड़े। नहीं तो हर बार हम केवल निंदा करते रहेंगे और हमारे बेटे ज़ान देते रहेंगे , इस हृदयद्रावक घटना में आतंकवादी तो जिम्मेदार हैं ही लेकिन कुछ और भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी से विनम्र निवेदन है कि अब कुछ ऐसा प्रबन्धन करें कि भविष्य में हमें अपने जवानों की ऐसी दुर्गति न देखनी पड़े और जिन मांगों के लिये जंतर मंतर पर धरना दिया गया था उन्हें पूरा करें और सीआरपीएफ के जवानों को पूर्ण सैनिक का दर्जा दें, क्योंकि अगर हम ऐसा नही करते हैं तो ईश्वर भी माफ़ नहीं करेगा ।

“उजली माँगों का रक्तिम रंग,
फिर अब दे भी क्या सकते हैं?
तुम दुनिया ही जब छोड़ चुके ,
हम तब दे भी क्या सकते हैं?
तुमने समस्त आशा-महलों —
को भस्म किया रक्षा में, पर,
श्रद्धांजलि के सिवाय तुमको
हम सब दे भी क्या सकते हैं..?”

नमन 🙏🙏🙏
अनुराग ‘अतुल’

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