“मर्यादा ” —–सुखमंगल सिंह

Sukhmangal Singh

9:46 AM (20 minutes ago)
“मर्यादा ”
दुर्योधन सा अपने को पट पर न लाओ /भरत भाई बनकर कलयुग में दिखाओ |
मान और शान बढे ऐसा कर्तव्य कर जाओ / सुन्दर आशियाना आग ना लगाओ||
जोरू जमीन हेतु झगड़ा होता आया /पर अपने जमीर को ठेस ना कभी पहुचाओ |
पिता आज्ञा ले राम चौदह वर्ष बनवास निभाये/ भाई पे लखन अंगुली नहीं उठाये||
शत्रुघ्न का भाई का जंगल भेजना न भाया/औ भरत मर्यादामें पूरा समय बिताया|
शास्त्र की मर्यादा में नीति नियम अपनाया / भाई – भाई में झगडा बीच न आया ||
आज भाई-भाई में विद्रोह की ज्वाला क्या कलयुग में कोई टालने वाला आयेगा |
जननी की कोख में सभी को सदा आना /परम्परा -परचम संस्कृति का फहराना ||
अपनी मर्यादा में रहकर दुनिया को दिखाना / संस्कृति सभ्यता धरा पर निभाना |
भाई-भाई मिलकर सदा एक साथ आना / पुत्र-पत्नी मोह कलिकाल ना दिखाना ||
गंगा जमुना संस्कृति कवियों ने सम्मान किया / भाई भाई को सबने मान दिया ||
-सुखमंगल सिंह ,वाराणसी

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