अंतस के पल (नवगीत ) —–सुशील शर्मा

अंतस के पल
(नवगीत )
सुशील शर्मा

याद की खुशबू से महके फूल हर सिंगार के।
आज भी तो याद होंगे मृदुल पल अभिसार के।

अर्थहीन आकारों में संग
प्रेम रहित ये अविरल डाह।
दीप्त विभव को खो कर क्यों है
दिनकर सी रजनी की चाह।

मनस के झंझावृतों में आरेख उस संसार के।
याद की खुशबू से महके फूल हर सिंगार के।

अस्फुट,अन्तस जर्जर क्यों है ?
तृणवत् प्राणों का स्पन्दन।
जीवन की शैथिल्य त्वरा पर,
मधु स्मृतियों का है अभिनंदन।

विरह के अंतस में खिलते फूल कुछ कचनार के।
याद की खुशबू से महके फूल हर सिंगार के।

मोह मृदुल अब बंधा रहेगा ,
स्मृति के अनुरागों से।
मन मोहक मधुवन सा सपना
लिपटा सुमन परागों से।

चांदनी, उन्मादिनी,सी मोह मुग्धा धार के।
याद की खुशबू से महके फूल हर सिंगार के।

खुले क्षितिज के उल्लासों सा
अभिसारी तेरा आँचल।
उर-मृग है स्वच्छन्द चपल सा ,
जैसे आवारा बादल।

स्वर तिरोहित मधुरतम प्रीत की झंकार के।
याद की खुशबू से महके फूल हर सिंगार के।

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