”निर्देयी समय“—सुषमा देवी

कविता

”निर्देयी समय“

निरन्तर चलता समय का चक्र, कभी नहीं यह रूकता

जीये- मरे कोई परवाह न इसको, कभी निदर्य नहीं झुकता ।

अंधियारों से नही है डरता ,न डर आँदी ,तूफान, बाढों का

इस बेरहम को डर नही लगता, गिरते हुए पहाडों का ।।

नही पसीजता इसका सीना, कुदरत के बरसते कहरों से

फर्क नही पडता इसको ,उजड़ती चमन की बहारों से ।

इसका न कोई संगाी साथी ,न किसी का इससे कोई रिष्ता है

चलता है अपनी धुन में यह ,फर्क न इसको मानवता का स्तर चाहे गिरता है ।

नही है रूकता यह निर्मोेही ,अबलाओं की आहों से

नही ं झुकता कभी नहीं ,बढते इनसान के गुनाहों से ।।

नही फर्क पडता है इसको ,किसी का आषियाना जलजाने से

इसको फर्क पड़ता नहीं किसी की ,घर ग्रहस्थी उजड जाने से

इसको फर्क नही काई झगडे ,मार- काट मचाए कोई

इसको फर्क नहीं जी पडता , चाहे लुटे- लूट जाए कोई ।

बड़ा ही निर्मम है निर्मोही आगे बढ़ता जाता है

कितना महान बलवान हो कोई समय को बाँध न पाता है ।।

Ûसुषमा देवी

गाँव व डाॅकघर भरमाड़

तहसील ज्वाली जिला कागड़ा

हिÛ प्रÛ

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