“ज़िंदा रहने के लिए”—– शबाना के.आरिफ़

Shabana K Aarif

2:42 AM (8 hours ago)
to me
“ज़िंदा रहने के लिए”   लेखक : शबाना के.आरिफ़
तन्हा हम हुए ज़माने में ये भी करम है ख़ुदा का
क्या होता ग़र ज़मीं भी न होती ज़िंदा रहने के लिए
शिकस्ता हैं ख़ुद से ये हमारी ख़ताओं की सज़ा है
जज़्बात के लम्हें सिसकते हैं ज़िंदा रहने के लिए
ग़ैरत छोड़ी रिश्ते छोड़े हया भी छोड़ दी हमने
आस्मां में इंसाफ़ बाक़ी है ज़िंदा रहने के लिए
तमाम उम्र गुज़री उनके शानों पे महकते हुए
नाक़द्र हम ही हुए ज़माने में ज़िंदा रहने के लिए

ख़राशें इस क़द्र हैं कि धड़कनें रुकी जाती हैं ‘आरिफ़’ ,

तबस्सुम भी ज़रूरी हैं यहाँ ज़िन्दा रहने के लिए..!
(स्व:लिखित रचना के लेखक शबाना के.आरिफ़ टीवी-फ़िल्म के स्क्रिप्ट लेखक हैं )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *