“कर्तव्यनिष्ठता” —डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

Dr. Rajni Agrawal

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to me
“कर्तव्यनिष्ठता”
अब ये किसका मोबाइल बजने लगा? तंग आ गई हूँ इन घंटियों के शोर से। बहू देख तो ज़रा …कहते हुए श्यामा ने बूढ़ी हड्डियों को सहारा देते हुए करवट ली।
“जीजी का फोन था माँजी, कह रही थीं-भैया को राखी बँधवाने जल्दी भेज देना। मेरी भी नन्दें आएँगी। समय से खाली हो जाऊँगी तो बेफ़िक्र होकर उठ-बैठ सकूँगी।”
“तू भी फटाफट तैयार हो जा।”
नहीं, माँजी ! इस बार मैं मायके नहीं जाऊँगी। आपकी तबियत ख़राब है। मैं चली गई तो पीछे से आपको देखने वाला कौन बैठा है यहाँ।”
“सालभर का त्योहार है री, तू मेरी चिंता छोड़ दे। तेरे भाई की कलाई सूनी रह जाएगी, जा रौनक के साथ झटपट निकल जा।”
शाम को घर लौटने पर रौनक ने माँ को मल-मूत्र में सना पाया।बैग रखकर वह माँ की सफ़ाई-सुथराई में लग गया।
“तू रहने दे, बहू आकर कर देगी।”
“बचपन में मेरे लिए न जाने कितनी रातें जागकर गीले में सोई हो।आज भी मेरे सुख की चिंता घेरे है तुम्हें। घर-बाहर क्या सिर्फ़ बहुओं का फ़र्ज़ बनता है बेटों का कोई फ़र्ज़ नहीं माँ के लिए?” कहते हुए रौनक ने माँ को साफ़ बिस्तर पर लिटाया।
बेटे की कर्तव्यनिष्ठता देख कर अपनी कोख पर गर्व करते हुए श्यामा की आँखें खुशी से छलछला आईं।
“ईश्वर तुझ सा बेटा हर माँ को दे”
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
वाराणसी।(उ.प्र.)

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