नशे पर क्षणिकाएं (आज तम्बाखू निषेध दिवस है)—सुशील शर्मा

Sushil Sharma 5:25 PM (2 hours ago) to me नशे पर क्षणिकाएं (आज तम्बाखू निषेध दिवस है) सुशील शर्मा तम्बाखू ने अपना रंग दिखाया केंसर को उकसाया पूरा गला कट गया जीते जी रामू को मरवाया। सिगरेट के दो कश Read More …

भारत बंद के नाम पर पुलिसिया उत्पीड़न— रिहाई मंच

Rihai Manch press note- भारत बंद के नाम पर पुलिसिया उत्पीड़न और फर्जी मुठभेड़ में गोली मारे गए पीड़ितों के परिजनों से रिहाई मंच ने की मुलाकात Inbox x Rajeev Yadav 6:19 PM (1 hour ago) to bcc: me Rihai Read More …

हिंदी की दशा और दिशा—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

हिंदी की दशा और दिशा—डॉ. श्रीमती तारा सिंह मानव को समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ कहा गया है, कारण एकमात्र मानव मस्तिष्क ही है, जहाँ विचार उत्पन्न होते हैं | इन विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा की जरूरत पड़ती Read More …

प्रायश्चित—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह

प्रायश्चित—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह  नित बसंत के सपने सजोये, जीवन जीने वाले , घनश्याम के घर एक दिन सचमुच बसंत बनकर , उसका प्रपौत्र  (रूपदेव) जनम लिया | उसे गोद में भरते ही ,उसके जोश, बल, दया, साहस , आत्मविश्वास Read More …

शरणार्थी—–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

शरणार्थी—–डॉ. श्रीमती तारा सिंह    पौष का महीना था | सलीम अन्यमनस्क मस्जिद के गुम्बद को निहारता , उसकी आँखों में उसके नैराश्य जीवन की क्रोधाग्नि , किसी सैलाब की तरह डुबो देने ,उसकी ओर बढ़ता चला आ रहा था Read More …

फिर भी तुमसे मिलने की प्रतीक्षा—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  फिर भी तुमसे मिलने की प्रतीक्षा—डॉ. श्रीमती तारा सिंह न  वादा,  न  भरोसा,  न   कोई    संदेशा फिर भी मनुष्य जीवन पर्यंत,मंदिर की दीप   शिखा  सी,  शांत  भावलीन होकर करता,    तुमसे   मिलने   की    प्रतीक्षा   क्योंकि  यहाँ  चित्रकारों  ने बना Read More …

जब से चक्षु मिलन हुआ तुमसे—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

जब से चक्षु मिलन हुआ तुमसे—डॉ. श्रीमती तारा सिंह  जब    से   चक्षु  मिलन  हुआ   तुमसे,   तबसे खींची  सोती  हूँ  तुम्हारे आकुल  आकर्षण में भूल गई मैं निज कर्म को, रहने लगी तुम्हारे चिन्तन   में   पुलकित  होकर, आँखें    बंदकर तन्द्रा   को Read More …

प्रेम रोग—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह

प्रेम रोग—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह      कोहरे   में   लिपटा   इस  धरा  गर्त  के अतल से निकलकर , असंख्य   दुख –  विपदाएं  , शत – शत भुज   फैलाए   , अग्नि – ज्वाल   की   लपटों   सी अँगराई   लेती      रहती   हैं,        इसलिए Read More …

आओ हम धरा को स्वर्ग बना लें—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

आओ हम धरा को स्वर्ग बना लें—डॉ. श्रीमती तारा सिंह      विषमता की धारा मुक्त होकर , धरा पर बहने न पावे मानवता  की  चट्टान  बनाकर  हम इसे यहीं रोक लें आओ, हम  सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग Read More …

दादी माँ… – विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’

vishwambhar vyagra 2:29 PM (1 hour ago) to me दादी माँ… (ग़ज़ल) माँ  से  भी  अच्छी  भाती   दादी माँ पिटने  से  मुझको  बचाती  दादी माँ मैं  सलौना  था  बचपन में कहती वो काजल-टीका  रोज  लगाती दादी माँ जब आजाता कोई Read More …