दो पेट के सनीचर -नाटक —dharmendra mishra

दो पेट के सनीचर -नाटक

 

1-

मार्च  का  समय था  ठण्ड  बहुत  तो  नहीं  फिर  भी  सुबह  एक  सूटर–जर्सी  भर  का  जाड़ा  तो  था  ही.  राम  भरोसे  तिवारी   एक  फुल   आस्तीन  की  बनियान  निचे  एक  गमछा  लपेटे  सुबह  -सुबह   हाँथ  में  एक  लोटा  लेकर  खेत  के  दो  चक्कर  काट आये थे  .

तीसरी  बार  जब  फिर  से लोटा  लेकर  बढे  जा  रहे  थे .उनके  पड़ोसी  कहे  या  जिगरी  यार सीतासरन तिवारी  दोनों  एक  ही  थाली  के  चट्टे -बट्टे  थे  .सोते  बस  अपने -अपने  घर  में  थे . बांकी   गांजा चिलम   साथ   ही  पीते  थे  .गंजेड़ियों  की  यारी  बड़ी   पक्की  होती  है  इतना अपनापा की अपने  माँ -बाप  ,सगे सम्बन्धी से भी  नहीं  होता .  जग  बैरी  हो  जाये   प्राण  देह  से  जब  तक  अलग  न  हो जाये  ये  भाईचारा  बरक़रार  रहता  है  . एक  दूसरे  की  नजर  की  भासा  पड़लेते  है  .हजार  आदमियों  के  हुजूम  में  भी  एक  गंजेड़ी  दूसरे  गंजेड़ी  को  जरूर  पहचान  लेगा  .प्यार -मोहब्बत  लड़ाई  –झगड़ा  सब  कुछ  होगा परन्तु   गंजेड़ियों  की  यारी  कभी   नहीं टूटती है .

सीतासरन  तिवारी  की  बीघा -दो बीघा गांव  में जमीन  है ,पंडिताई  का  भी  काम  करलेते  है .जिससे  उनका  घर  खर्च  चल  जाता  है . रही  बात  चिलम – गांजा की  इसका भार  रामभरोसे  तिवारी  के जिम्मे  है . रामभरोसे  तिवारी  दस -पंद्रह  बीघा  जमींन   के  कास्तकार  है  .बड़ा  वाला  लड़का  सरकारी  महकमे  में  नौकरी  करता   है . घर  से  संपन्न आदमी है  किन्तु अंदर   से  उतने  ही  कृपण है . मजाल  क्या   किसी  की  जो  उनसे  कोई  एक  दमड़ी भी  निकाल  सके  . भिखारी भी  उनका  घर  छोड़  कर  मांगता  है  . अपने  घर  कैसे  भी  रुखा-सूखा  ही  खाएंगे  परन्तु  किसी  के  घर भोज  में  जायेंगे  तो  ऐसा  खाएंगे  की  नाक   काट  ले  .पंगत  बैठी  की  बैठी  रह   जाये  ,सेवइया पिने  में उतारू हो जाये   तो  दोने  पे  दोना  मांग  –मांग  कर  खाएंगे . जब  तक   सामने  वाला  मना न  करदे  .बस  पंडित  जी  अब  उठ  जायो  परन्तु  रामभरोसे  तिवारी  को  सरम  छूकर  भी  न  गुजारी है .खाने-पीने  के  मामले  में  सीतासरन  भी  पीछे  नहीं  उन्नीस -बीस का ही फर्क  है  .

गांजा का  सुट्टा लेने  के  बाद  तो  ऐसा  लगता  है  जैसे  स्वर्ग  के  द्वार  ही  खुल  गए  हो  . जैसा भी  जितना  भोजन  मिले  सब  कम  है  .पेट  फट  कर जब तक  बाहर  न  आजाये ,उहा -पोह  दे  कर  खाएंगे .

सीतासरन –  आज  सुभह  से  बनियान  पहन  कर  काहे  अंगप्रदशन  कर  रहे  हो  भाई .हाजमा  तो  दुरुस्त  है  न  .

रामभरोसे –   सौक  थोड़े  ही  न  लगी  है  सुबह   से  लोटा  लेकर  फिरने  की  .ई असुरे  हाजमे  को  भी  ऐन  वक़्त  पर  ही  ख़राब  होना  था  .दुसमन  को  भी  या   दस्त  नाम  की  बीमारी  न  लगे . अंदर –बाहर  सब  पानी-  पानी  .कुछ  खाओ  रुकता  ही  नहीं .

सीतासरन –  मै  तो  कहता  हूँ  एक  पैखाना बनवा  ही  लो  .फिर  चाहे  दिनभर  वही  बैठे  रहो .अब  तो  सरकार  भी  बड़ा  परचार -परसार  कर  रही  है .देश  के  सारे काम  पीछे  .वो  क्या  कहते  है  अंग्रेजी   में  लैट्रिन  पहले  बनवाओ  .देश  गरीबी  की  आग  में  झुलस  रहा  है  .पेट  में  कुछ  होगा  तो  निकालेगा आदमी .जो  भी  हो  अब  तो  बनवाना  ही  पड़ेगा  नहीं  पिछवाड़े  डंडा  भी  पड़ेगा . सरकार  ने  इसकी  भी  व्यवस्था  कर रखी है  .

रामभरोसे -मई का  लाल  जो  हाँथ  भी  लगा  दे  .मै तो  खेत में ही  करूँगा  .जब  तक  पिछवाड़े में  ठण्ड -ठण्ड  वायु  न  लगे  मौसम  ही  नहीं  बनता  .जो  आनंद  प्राकृतिक  शौच  में  है  वो  भला  ई  लैट्रिन  में  कहा  .खादी भी तो बनती है .

सीतासरन – मै तो बनवाऊंगा. सोच  रहा  हूँ  .कोई  जजमान  सेट  कर  लूँ  .दो – चार   हजार  की  बात  है  बनवा  ही  देगा .

रामभरोसे -मुझसे   तो  अपने  पैसो  से  न  बनवाया  जायेगा  .

सीतासरन  –

एक  गड्ढा  –कमोड  ,ऊपर  से  टीने  का  एक  छापर  लो  लैट्रिन  तैयार . हजार – चार  हजार  के  लिए  कहे  हुज्जा –फजीहत  करते  हो  .

रामभरोसे – तुम  तो  ऐसे  कह   रहे  हो  जैसे  दो -चार  हजार  बगारे में  पड़ी  हो  ,सेत का पैसा  हो .

सीतासरन -सरकारी फरमान है भाई ,तुम अकेले थोड़े ही न हो दुनिया बनवा रही है .

रामभरोसे -सरकार  को   इतनी  ही  फ़िक्र  है  तो  बनवाये .सरकारी  पैसा  जितना  मिल  जाये  उतना  कम  .

.देश  में  लूट  है .सरकारी  खजाने  में  ये  नेता  लोग  कुंडली  मार  के  बैठे है  .कुछ  हम  गरीबो  के  हिस्से  भी  तो  आये .

सीतासरन -छोडो  फजूल की बाते.क़ाम  की  बात  सुनो   .आज  ऐसा  भोज  खिलाऊंगा  की तुम्हारी पांचो इंद्रिया खुल जाएँगी . सालो  याद  रखोगे  .

रामभरोसे –

रहने  भी  दो  भोज  का  नाम  भी न लो .पिछली  बार  भोज  कह  कर  लेगये  ,पता नहीं कौन जाती का  करम का भोज  खिला  दिया  .एक  नंबर   के  बकबादी –झूठे ,धूर्त ,लम्पट  इंसान   हो ! तुम्ही  रखो  ,अपना  रजाई  –गद्दे ,कैंडिल,छाते ,

खूब  मालिश  करवाओ  चमेली  का  तेल  लगवा  कर .

सीतासरन -अरे -सुन  तो  लो  पहले  ,राजधानी  एक्सप्रेस  की  तरह  भागते  हो .छब्बे  सिंह  के  नाती  का  कर्णवेध  संस्कार  है  .ऐसे  –ऐसे  दुर्लभ   स्वादिष्ट पकवान  खाने   को  मिलगे  जो  आज  तक  मयासर   न  हुए.

रामभरोसे  – क्या  बात  करते  हो  .तब  तो  तुम्हारी  आज  चाँदी है   .दो  तीन  दिन  का  काम  तो समझो  होगया  ऊपर  से  500 -हजार  रूपये की  दान –दक्छिना  मिलेगी  अलग .

सीतासरन -वो  बात  तो  है  .दोपहरी  तैयार  रहना  .अभी  जो  हाजमा – वाजमा  ठीक  करना  है  करलो  .

रामभरोसे –

मै तो  न  चल  सकूंगा  .साल  भर  होगये  टिल्लू  की  सादी   हुए  ,एक  बार  भी  उसके  ससुराल   न  जा  सका  .

हमारे  समधी  साहब  बड़ा  जिद  कर  रहे  है  ,एक  बार  आइये  घुमजैए .लेकिन  ये  कम्बख्त   हाजमे  को  आज  ही  ख़राब  होना  था .फिर  भी   जायूँगा  ,होगा  सो  होगा  .घंटे  भर  का  सफर  है  ,कोई  दिक्  न  होगी  .गाड़ी  पकड़ी  सीधा  दरवाजे  पर .सहर  है  भाई  ,आज  कल  तो  इतने  मोटर  वाहन सड़क में दौड़ते है .पकड़ -पकड़  कर  ले  जाते  है  ,हमारी   गाड़ी  बैठो  , हमारी   गाड़ी  बैठो  .

सीतासरन –

साम को  जाओगे  न  .अभी से  कहे  तडपाडिया रहे  हो  .कर्ण-बेध है  टेम ही  कितना  लगता  है  .सोलह  संस्कारो  में  मुझे  तो  ये  सब  से  अच्छा  जान  पड़ता  है .

दो  -चार  मंत्र  पढ़ा  ,कान में  सुई  छेदी ,होगया  क़ाम  ,भोजन  –भजन   लो  ,दक्छिना  समेटो  अपने  घर .

रामभरोसे –

तो  तुम  जाओ  कौन  मना  कर  रहा  है  .मै  तो  न  जा  पाउँगा . बेटे  की  ससुराल  जा  रहा  हूँ  .वो  भी  पहली  बार .वहाँ मुँह  दिखाई  करवाने  थोड़े  ही  न  जारहा  हूँ  .वहाँ  भी  कोई  कम स्वादिष्ट  पदार्थ  न  बनेगे  .तब  तक  हाजमा  भी  दुरुस्त  होजायेगा  ,पूड़ी -दो  पूड़ी  खा  ली बांकी आज तो गले तक मिष्ठान ही लेना है .

.

 

सीतासरन  -ये  तो न मर्दानगी  वाली  बात  कह  दी  .बाल्टी  का  बाल्टी    सेवइया  पीने  वाला  आदमी  ऊपर  से  बीसियों पूड़ी  हजम  करने  वाले के  मुँह  से  ये  बात  सोभा  नहीं   देती  है  .ठण्ड का मौसम है इतना tension कहे लेते हो .सब पच जायेगा.

रामभरोसे  – ऐसी बात है तो चल  दूंगा  लेकिन  जादा  नहीं  खायूँगा कहे  दे  रहा  हूँ  .तुम  को  जितना  ठूसना  होगा  ठूसना  .हा रामभरोसे -हा  रामभरोसे  दो  पूड़ी – दो  पूड़ी  और  .आज  जबरजस्ती  न  चलेगी.आज तुम्हारा साथ न देपाउँगा.

सीतासरन – ठीक  है  भाई  एव मस्तु  .जो  तुम  कहो  .आज  तुम्हारी  मर्जी  .लेकिन  खाना न खाना  साथ जरूर देना  बैठे रहना .

2-

रामभरोसे  नाहा  धोकर  10 बजे  ही  सीतासरन  के  घर  पधारगये.

चलो  भाई  देर  काहे  करते  हो  .जल्दी -जल्दी  निपटा  देना  कार्यक्रम  ,खापीके  सीधे  घर .जिससे  साम   को  पेट  खाली  रहे  .

सीतासरन -सबर  करो  ,सबर  का  फल  दुर्लभ  है .जल्दी जाऊंगा  तो  वो  मान -सम्मान  नहीं  मिलेगा  .समझेंगे  पंडित जी  को   और  कोई दूसरा   काम  नहीं.  सुभह  से   ही  आकर  बैठ  गए  .जब  तक  दो–चार  बार  कोई  बुलाने  न  आएगा  तब  तक  हिलूंगा भी नहीं .

रामभारसे -भाई  तू  फुर्सत  आदमी .तुम्हारी नौटंकी में मेरा नुकसान होगा समझा करो .मुझे  तो  जाना  है  न .

सीतासरन – बात -बात पे रोया न करो .चलो  एक  बार  भी   कोई  बुलाने  आजायेगा  तो  चल  दूंगा .तब  तक दो  –चार सुट्टे ही मार ले . भरो चोंगी.

रामभरोसे – मुझे  भी  बड़ी  अमल  लग  रही  है  .दो  सुट्टे  में  तो  पेट का सैतान भी जग जायेगा.

गांजे के आनंद में मगन थे . छब्बे  सिंह  आते हुए  दिख गए  .दोनों  पेट  के  सनीचर  अंदर  की  ओर  भागे.

घर के बारमदे  में  ही  एक  छोटी  सी  मंदिर  थी  .सीतासरन  पद्मासन  में  बैठ  कर  जोर -जोर  से  रामायण  की  चौपाई  ,मंत्र  जो  समझ  आरहा था ,दीर्घा स्वर में   अलाप   चालू  कर  दिया .

छब्बे  सिंह -अरे  पंडित  जी  चलो  भाई  ,आप  का  ये  पूजा  -पाठ तो  रोज  है  .कही  न  जायेगा .पंडित  जी -पंडित  जी .कई बार आवाज दी .

पंडित  जी का आलापऔर  तेज  होगया .

छब्बे  सिंह -अभी  गांजा भर  रहे  थे  .ये  ढोंग  बाद   में   रचना  .चलना  हो  तो  चलो  ,नहीं  पंडित  की  कमी  नहीं  है .

सीतासरन  हक़ -बकाने  का   स्वांग  रचते  हुए  ,कौन  –कौन !

अरे  ठाकुर  साहब  आप  कब  आये मुझे  तो  पता  भी  न  चला  .

एक  बार  भगवन  की  भक्ति  में  लीन  हो  जाऊ   तो  समझिये  आत्मा  के  तार  सीधे श्री   हरी  विष्णु  से  जुड़  गए .

फिर  तो  संसार  की  मोह–माया  मुझे  छू भी  नहीं  सकती .लोगो   को  मरने  के  बाद  मोछ की प्राप्ति होती है  .मैंने  तो  जीते जी संसारीक  बंधन में  रह कर मोछ प्राप्त कर लिया. मेरा जीवन तो अब जन्म- मृत्यु के बंधन ,इस भवसागरसे से परे है.अब तो बस श्री  हरी  के  चरणों  में  पड़ा  रहूँगा .

छब्बे  सिंह – गांजा भरभंड मा चढ़ गई लगता  है . कम पिया करो. नहीं  श्री  हरी स्वयं प्रकट हो जाएंगे.

.जल्दी  से  हमारा  काम  निपटा  दो  . प्रवचन  सुनने  का  समय मेरे पास बिलकुल  नहीं  है .

सीतासरन -आप   निश्चिंत   रहे  ठाकुर  साहब  .बस  जल्दी  से  एक  कुरता  पहनना है . गरीब  भ्रह्मण क्या  सजना  सवरना ,एक  कुरता  है  वही  पहन के चलता  हूँ  .वो  भी  आप  जैसे एक  नेक  दिल यजमान ने  दिया  था .

छब्बे  सिंह -अरे  भाई  चलो  जल्दी  .लेलेना  एक  कुरता  ,कौन  लाख  टके  का  है .

इतना  सुनते  ही  सीतासरन  के  बदन  में  बिजली दौड़  गई .

सीतासरन – बस आप पूजा की तैयारी कीजिये .मै अभिलम्ब  प्रकट हो जाऊंगा .

छब्बे  सिंह – आहि जाना .गांजा मत भरने लगना,दोबारा नहीं आऊंगा.

3-

सीतासरन  ,के  कहे  अनुसार सारि पूजा की सामग्री  विधि -विधान से  छब्बे  सिंहने पूर्ण करवा लिया .

सीतासरन   दो  चार  मंत्र  संस्कृत  के  ,इधर  का  मंत्र  उधर – उधर का इधर पढ़  दिया  .

कान छेदने की  बारी   आयी  .क्या  नाम   है  बेटा  .तू  तो  राजा  बेटा  है ,शेर है ,कुलदीपक  है .रोना  मत  ठीक  है .

उधर  देखो  ऊपर  मामा  की  तरफ .

सामने  से  एक  आवाज  आयी  ऐ पंडित  का   बक  रहे  हो    .मै  अभी  जिन्दा  हूँ  .ऊपर  जाये  हमारे  दुसमन .

सीतासरन  –तो  आप  मामा  है .छमा चाहूंगा ठाकुर  साहब  ,उम्र  गुजर  गई  आज  तक  यही  कह  कर …

बच्चे  की पे  -पे  की आवाज  आयी  .

सीतासरन  गर्वित  मुस्कान  के  साथ  ये  लीजिये  हो  गया  ,बच्चे  को  पता  भी  नहीं  चला .

अब  क्या  सभी  लोग  एक  स्वर  में  वाह  पंडित  जी ! हमें  लगा  पता  नहीं  ये  कान  कैसे  छिदवाये  गा ,घर  सर  पे  उठा  लेगा  .

सीतासरन -फूल  के  कुप्पा   होगये – ऐसे  ही  नहीं  लोग  मुझे  ,महा ज्ञानी  !पंडित ! कहते  है .

बीच में से ही  किसी  ने – झूठ  न  बोलो  पंडित  ,पोंगा  पंडित  कहते  किसी  का  मुँह  नहीं   थकता  .

सीतासरन  ,बेइज्जती होते  देख  -ये  संसार  सागर  है  .किसी  का  मुँह  थोड़े  ही  न  कोई पकड़  सकता .

हम  तो  पंडित  आदमी  प्रभु सेवा ही हमारा धर्म है .जिसने जो  दिया  उसी को  लौटा  दिया .

छब्बे  सिंह -चलो  भाई  पंगत  लगाओ  देर  न  करो  .सब   खा – पिले  अपने  -अपने  घर  जाये , भोजन की राह देख रहे है .

सीतासरन  –हा बिलकुल  खाने का कार्यकर्म  जल्दी  करवाइये .इधर से सब ओके है .मुझे  भी  कही  दूसरी  जगह  एक  कथा  करवाने जाना है .

पंगत  पड़ी  दोनों  मित्रो  ने  मोर्चा  संभल  लिया  .सीतासरन  जैसे  साँस  लेना  ही  भूल  गए  ,पत्तल में पूड़ी  पड़ती नहीं गट से अंदर .

परोसने  वाला  जब  तक  पूरी  पंगत  का  फेरा  लगाकर  वापिस  लौटता   सीतासरन की पत्तल खाली ही पता .

सीतासरन -लाओ  भाई  पूड़ी  रामभरोसे  भाई  के  डालो  कब  से  खाली  पत्तल  लिए  बैठे  है .

डालो -डालो ,हा-हा अरे डालो  ,न नुकुर की इनकी पुरानी आदत है .

रामभरोसे  अंदर  ही  अंदर  कुढ़  तो  रहे  थे  लेकिन  कुछ  कह  न  सकते  थे .नहीं  भाई  मैं  नहीं लूंगा,मेरा हो गया .

मेरे  बदले  भी  सारी पूड़ी  सीतासरन  के  पत्तल  में  डाल  दो .

सीतासरन -अरे -लो – लो  दो  पूड़ी  में  ही  हिच्च बोल  गए  .अभी  तो  खेला  सुरु  हुआ  है  ,अभी तो सेवईया  आनी बांकी है .

खाने  पिने  में  कहे  की  शरम ,पड़ोसियों  की  तरफ   नजर दौड़ते हुए  .कोई तो हा में हा मिलाये .

पंगत  से  ही  एक  आदमी  महासय को  हीरामन कहते है.-पंडित  जी  आप  को  सरम  आये या  न  आये  हमको  तो  आरही  है  .पंद्रह मिनिट से  भैंस  की  तरह  भरे  जा  रहे  हो .25-30 तो  खा  गए  ,ऊपर  से  सेवईया  की  तरफ   उबासी  मार  रहे  हो .

सीतासरन -ये  गलत  बात  भाई ,सब  का  अपना  –अपना  आहार  ,तुम  फूल  सूंघ  ते  हो  इसमें  हमारी  का  गलती  .दोबारा  ऐसी  बात  कही  तो  फिर  समझ  लेना  सीतासरन  नाम  नहीं .

हीरामन -सीतासरन  नहीं  सनीचर  कहो  और  ये अकड़  किसे  दिखा  रहे  हो  .क्या  करलोगे ?

सीतासरन -खाने पर बैठे नहीं होते तो तुम्हारा टेटुआ मरोड़ देता  .

हिरामन –

दो  मंत्र  तो  ठीक  से  पढ़ना    नहीं  आता,कंडील समेटते  फिर  ते   हो ,ढोंगी ,बेसरम

पंडित  के  नाम  पर  कलंक  हो  .

सीतासरन  तमतमाते  हुए उठे -हीरामन  तुम्हारी  जबान  खींच  लूंगा .

छब्बे  सिंह  बीच  बचाव् करते हुए .बस   बहुत  हुआ  .मारपीट  करने  के  लिए  निमंत्रण  नहीं  दिया .हमारे  दरवाजे  नहीं  , कुस्ती बाहर करना.

4-

पंगत  ख़तम  हुई   ,सीतासरन और  रामभरोसे  घर  की  तरफ  हो  लिए.

सीतासरन  –हरामखोर   ने  सब  मजा  किरकिरा  कर  दिया  .पूड़ी – चार  पूड़ी  अभी  और  लेता  मैन  itam

तो  खा  ही  नहीं  पाया  .

रामभरोसे -निहायत  ही  धूर्त  आदमी  हो  .तुम  को  मरता भी तो  मै   कुछ  न  बोलता.

तुमको  पहले ही   कहा था  .अब  समधी  जी  के यहाँ  खाक  खाऊंगा  .पेट  है  की  सुबह  से  गुडर-गुडर  किये  जा   रहा  है .

सीतासरन  –मरे  काहे  जा  रहे  हो  .साम को  जाना  है  न  .अभी  घंटे  दो  घंटे  समय  है  ,चूरन  खाओ  तालाब  में  ही  बैठे  रहना.बार- बार पानी लेने भी नहीं आना पड़ेगा .

रामभरोसे – तुमको  लोग  सेत-मेंत में  पोंगा  पंडित  नहीं  कहते  .पेट  है  कोई  मशीन  थोड़े  न . डाला  –निकाला ,समय  लगता  है  .

5-

सामको रामभरोसे  मखमली  कुरता , इतर –फुलेल  लगा  कर   तैयार  होगये.

सीतासरन  के  पेट  की  छुधा  अभी  शांत न  हुई थी  सोचा  एक  बाजी  और  खेल  ली  जाये  .

सीतासरन -रामभरोसे  भाई  घर पर  हो  .अभी  गए  नहीं  .मैंने  सोचा  अब  तक  जा  चुके  होंगे  .

रामभरोसे -जब  तुम  को  ऐसा  लगा  तो  फिर  क्या  लेने  आये  हो .

सीतासरन -वो  मैंने  सोचा  एक  बार  पता  करता  चलूँ  .छोडो  ये  बात  पेट  तो  ठीक  है  न  .नाहक  ही  आज  प्राण  दोगे  .अकेले  क्या  खाओगे  .

रामभरोसे -सीधे -सीधे  कहो  ,मरभुखे  की  भूख  अभी  मिटी  नहीं  .तुमको  भी  चलना  होगा  ?तुम्हारी  आंख  और  मुँह  दोनों  से  लार  टपक  रही  है  .

सीतासरन -हा  हा !तुम कुछ कहो मुझे बुरा नहीं लगता .मेरा  पेट  तो  पूरा  हल्का  होगया  है .क्या  कहते  हो .

रामभरोसे -कहना  क्या  चलो  .नहीं  रात भर  तुम्हारे  प्राण  सूखेंगे  ,पता  नहीं  क्या  –क्या  पकवान  खा  रहा  हूँ .

क्या पता सुबह तक तुम बचो ही न.

सीतासरन  तो  फिर  चलो -मुझे  पता  था ,मुझे लिए बगैर तुम न जाओगे . इसी लिए  तैयार  हो  कर  आया  हूँ  .

रामभरोसे -तुम्हारा पेट  है की कुंड  .पीछे  से  देह  निकल  आयी  तो  मै  जबाबदार न  होऊंगा  कहे  दे  रहा  हूँ  .

सीतासरन -राम -राम  शुभ  कहो   ,अब नाहक  ही समय  न  गबाओ  नहीं  फिर  रात  होगी  .चलो  फिर  जल्दी  करो .

6-

दोनों  पेट  के  सनीचर  गाड़ी  पकड़  कर  चल  दिए  .साम  दिन  डूबने  से  पहले  ही  पहुंच  गए  .

रामभरोसे के समधी जी अयोध्या प्रसाद दुबे बाहर  से  ही  देख  कर  दौड़ पड़े – आइये -आइये  . दंडवत  पैर में  गिरपड़े-अहोभाग्य  हमारे  आप के दरसन हुऐ  .मेरे  तो  आज  भाग्य  ही  खुल  गए .

रामभरोसे  –आप  से  ज्यादा  हर्ष  का  अनुभव  तो  हमें  हो  रहा है  .करे  तो  करे  क्या  समय  संयोग  ,जब  जहा  बदा  होत है  वही  होता  है.

समधी  जी  सीतासरन  के  पैर  छूने  के  लिए  झुके  ,रामभरोसे  -अरे -अरे  इनके  पैर  नहीं  छूना  है  ,ये  ऐसे  ही  है  .

सा -सम्मान  दोनों  को  आदर -सत्कार के साथ  बैठाया गया .रामभरोसे  के  पैर  थाल  में  धुले  गए  .सीतासरन  मन  मसोसते  हुऐ  ,धीरे  से  धूर्त  कपटी .

रामभरोसे  – जुबान  न  खुले  .भोजन  में  ही खोलना .

सीतासरन -मेरा  इतना  अपमान  आज  तक  किसी  ने  नहीं  किया  .जजमन  के  घर  डेहरी  पे  कदम  पड़ते  नहीं  की  थाल  ले  कर  दौड़  पड़ते  है  .चरणामित्र  समझ  कर  पीते  है .

रामभरोसे  -सम्मान  भी  अपमानित  हो  जाये  जो  तुमजैसे  ढोंगी  के  पास  फटक  जाये .महापात्र  का  जो  कर्म  करे  उसके  पैर अपने समधी से  धुलवा  के  पाप  नहीं  लेना  .

7-

अंदर  मेहमानो  के  लिए  अच्छे से अच्छा भोज्य-पदार्थ तैयार किया  जा रहा था ,समधिन भी बड़ी प्रसन्न थी हो  भी क्यों न सादी के बाद पहली बार समधी जी घर जो  पधारे थे .

रामभरोसे की बहु  भी   मायके  में ही   थी  उसे  पता  था  पापा  जी  मीठा खाना  बहुत पसंद करते  है .

समधिन जी-बबली अपने ससुर  के  स्वागत -सम्मान  में  कोई  कसर न  रहने  देना .ऐसा भोजन तैयार करना की सालो तक याद रखे.समधी है रोज-रोज थोड़े ही न आएंगे .

दोनों  माँ बेटी बड़े जतन से लगी थी .सेवईया ,गुलाबजामुन ,गाजर  का  हलवा ,रसमलाई ,रबड़ी , तरह  –तरह  के  पकवान .

8-

भोजन तैयार हुआ दोनों पेट के पुजारी खाने पर बैठे .

इतने  सारे  पकवान  देख  कर  तो  सीतासरन  की  आंखे  चौधिया  गई .क्या  खाउँ  . कहाँ से  सुरु  करूँ .

मन  ही  मन योजना बान रहि थी .  सभी  मिष्ठान  दस -दस  प्लेट  से  कम  न  खाऊंगा  .ये  कपटी  साथ  देदेगा  तो  चार – पांच  प्लेट  और  खालूँगा.

रामभरोसे -इतना  सारा  कुछ  बनवाने  की  क्या  जरुरत  थी ,वैसे  भी  आज  हम  एक  निमंत्रण  से  आरहे  है.भोजन के प्रति आज विशेष रूचि नहीं है .

सीतासरन -तो  क्या  हुआ ,पहली  बार  तसरीफ  ला  रहे  है .समधी का स्वागत आदमी  ऐसे  ही करता है.मै जब अपने समधी के यहाँ जाता हूँ तो ऐसी आवभगत करते है  की पूँछिये मत .लगता है क्या न खिला दूँ ,इससे भी ज्यादा सम्मान .

अयोध्या प्रसाद  -कहिये  अगर  सम्मान में कोई कमी  रह गई हो तो .हमने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिस की .

रामभरोसे -नहीं -नहीं ऐसी कोई बात नहीं ,हम तो आप के इस प्यार और स्नेह से गद-गद होगये .इससे ज्यादा सम्मन की अपेछा और क्या कर सकता है आदमी . सीतासरन की तरफ घूरते हुए- इनकी तो आदत है मीन -मेख करने की .खुद के घर कैसे भी खाये दुसरो के घर छप्पन  भोग ही खाएंगे .

भोजन सुरु हुआ .

सीतासरन  भोजन पर टूट पड़े.दो – चार  पूड़ी  खाई . मिष्ठान  पर  चढाई कर दी.पांच  प्लेट  गाजर  का  हलवा ,पांच  ही  प्लेट  सेवईया  ,रसमलाई , गुलाब  जामुन  की  तो  अभी  बरी  ही  नहीं  आयी .

रामभोरे  दो -दो प्लेट  सभी  itam  खाया  हिच्च  बोलगये .

अयोध्या प्रसाद -और लजिए ,आप तो दो प्लेट में ही आनाकानी करने लगे .

रामभरोसे -बस – बस  अब  और नहीं ,पहले  ही  कहे रहे ज्यादा न खापाउँगा .

सीतासरन  की  तरफ उठने का इसरा करते हुए -ये  महासय  तो  वैसे  भी  मिस्ठान कम  ही  खाते  है  .

सीतासरन  कहे  तो  कहे  क्या  ,रसगुल्ला  और  रसमलाई  की  योजना  धरी  की  धरी  रहगाई .

मजबूरन भोजन से उठना पड़ा.

9-

सीतासरन  आग  बबूला  होते  हुए  –तुम  को  नहीं  खाना  था  ,तो  चुप -चाप  पांच  मिनट और  नहीं  बैठे  रहा  जा  रहा  था .

रामभरोसे – नाक नहीं  कटवानी  मुझे  अपनी  ,बेटे  की  ससुराल  है  कोई  खैराती भोज नहीं. हांथी की तरह भरे जा रहे थे.

तुम  को तो शर्म है नहीं  ,खाने  –पीने  का  ढंग  होता  है .आराम  से  खाओ  ,मरभुखे  की  तरह टूटपड़े जैसे  खाना  ही  न  देखा  हो  .

सीतासरन  –बस  बहुत  होगया  ,ज्ञान  न  बघारो  .दूध  के  धुले   नहीं  हो .ये  जो  तोंद  निकली  है  खैराती  भोज  खा – खा कर ही  निकली  है  .घर  पर  ढंग  की  तरकारी  भी  न  खाते  हो.

इतने  में  समधी  जी  आगये   .चलिए  महराज  बिस्तर  लग  गया  है  आराम  करिये  , बाते  तो  होती  रहेंगी  दो  –तीन  दिन  तो  आपको  यहाँ  से  हिलने  भी  न  दूंगा .आज  तो  निमंत्रण  का  बहाना  बना  दिया .नहीं  दो  –चार  पुड़िया  खा  के  न  उठने  देता  .मिष्ठान  तो  कुछ  खाया ही नहीं  .आप  की  समधन  तो  बहुतया नाराज  है  .अब  आप ही समझाइये .

रामभरोसे -समधिन  जी  से  कहिये  हमें  बहुत  खेद  है .सेवा  का  मौका  मिलता  रहेगा  ,कौन  सा  ये  है  की  अब  आएंगे  ही  नहीं .आप  जैसे  समधी  पा के  तो  हम  धन्य  हो  गए  .

आज  भी  गॉंव में  लोग  कहते  है बारातियो  की  जितनी  सेवा  सत्कार ,औभगत  टिल्लू  के  ससुराल  में  हुई  उतनी  गॉंव  में  किसी  और  के  यहाँ  नहीं  हुई .

समधिन  जी भी  दरवाजे  की  ओट  लेकर  खड़ी  थी  .ये  सुनकर  प्रसन्न हो  गयी .

समधन  जी -ईया सब  बहाना  न   चली  ,बड़े  मेहनत से  बनाये  रहे  .बबली  तीन  दिन से  कह   रही  ,हमरे     पापा  जी  का  मीठा  बहुतय पसंद  है .

रामभरोसे -क्या  बताऊँ   समधन जी  , छमा     प्रार्थी  हूँ   ,आप  लोगो  का  इतना स्नेह  देख  कर  ही  पेट भर गया  .भोजन  में  इतनी  मिठास  कहाँ जो  वाणी  में  है .

सीतासरन   –ये  बात   तो    है. मिष्ठान का  क्या  .वो  तो  जितना  बासी  हो  जाये  उतना  ही  लजीज  हो  जाता  है.जब  से  घर -घर  में  फ्रीज का ट्रेंड  हुआ  तब  से  लोगबाग   2 -3 दिन  का   बसियय  खाना – खाना  पसंद  करते  है .

समधिन  जी -खात होइहि  पंडित  जी  .ईया  ब्राह्मण  का  घर  आय,इंहा बासी  खाना  कोहु  नहीं  खाय .

सीतासरन  को  लगा  कही  मिठाई  वाला  itam ब्राहमणत्व  का  भेट  न  चढ़  जाये ,एक   दाव और  मारुं.

सीतासरन -अहा -अहा !बहुत -सुन्दर !अतिसुन्दर क्या  विचार है !  लोक  लाज  मर्यादा ,पालन  ही  ब्रह्मण  का  पहला  कर्त्तव्य  है  .बांकी  चीजे  बाद  में  .हमारे  समाज  में  तो  लोग  आज  कल  धर्म  और कर्म  के  नाम  पर  व्यभिचार  करते  है  ,खोखला  दिखावा बस बचा है . ब्राह्मण  समाज  तो भ्रष्ट होता जा रहा है. पेट पूजा पहले बांकी कम बाद में. घोर कलयुग है ,नर्क के सब  भागीदार है.

समधिन  जी -पंडित  जी  अपना  बहुत  ज्ञानी  –सिद्ध  पुरुष  मालूम  होइत  हे .हम ता  अनपढ़  बस  एतनाय जनित  हैन ,जउन राह रीती  पूर्वज   सीखा  गए  रहे  ,ओहिन मा  चले  का  है .

सीतासरन -ये तो  बहुत ही  उच्च कोटि  के विचार है . आप अनपढ़  अपने  आप को कह  रही है आप से बुद्धिमान महिला तो मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा . लेकिन  मिष्ठान  कभी  बासी   नहीं  होता समधन  जी.जब  तक  ख़राब न  होजाये  तब   तक  आप  खा  सकते  है  .

समधन  जी -अच्छी  बात  पंडित  जी  .सब  फ्रीज़  मा रखवाए  दे  रही  हूँ  ,अब  अापय बड़े  बिहन्ने  खाइयेगा .

सीतासरन ठहाका लगाते हुए -हा !हा! समधिन  के  हाँथ  हमें  पीटना  थोड़े  ही  न  है .

10-

रात गहराती जा रही थी .

रामभरोसे  की आँखों  से नींद कोसो दूर  पेट  अंदर  ही  अंदर  गुड़ -गुडा रहा  था  .संडास कमरे के बाजु में ही था . रामभरोसे को लगा  कही  बिस्तर  में  ही  न  क्रिया -कर्म हो जाये . भागे  संडास  की  तरफ .देखा  ऊपर  ,निचे  किसिम -किसिम के  नल  लगे है  .निचे  संगमरमर का फर्स,कई   छेद कुछ  समझ ही न पड़ रहा था .ये संडास वाला छेद कौन सा है .पहली  दफा  था  .गांव  में  तो  तालाब  ही  संडास  था .रिस्तेदारी  भी  सभी  आसपास  के  गांव  में  ही  थी . जहाँ खेत में ही काम हो जाता था .असमंजस  की स्थिति  में फस  गए .काफी देर तक सोच -विचार करते हुए खड़े रहे -ये  ससुर  लैट्रिन   वाला  छेद  कौन  सा  है  .

ये  कपटी  सीतासरन  भी कभी -कभी  ठीक  बात  कहता  है .पहले  पता  होता  ऐसी  विपदा  आएगी  तो  किसी  की लैट्रिन  जा  कर   देख  आता  करते  कैसे   है .

सीतासरन  की  तरफ  भागे  ,सीतासरन  गहरी  निद्रा  में  खर्राटा ऐसा  की  किसी  मोटर  –गाड़ी  से  कम  आवाज  न  निकल  रही  थी  .

रामभरोसे ,सिरतसरन  को जोर से  हिलाते  हुए -ट्रैन का साइरन न बजा ,इमरजेंसी है .

सीतासरन  हकबका  के  उठते  हुए -क्या  होगया .कौन  मरगया ,चैन से खाने न दिया सोने तो दो .

रामभरोसे -खूब  सोना  पहले  ये  बता ,लैट्रिन   वाला  छेद  कौन  सा  है  ,जल्दी  बता  .

सीतासरन -लैट्रिनवाला  छेद  मेरे  मुँह  में  नहीं है  ,लैट्रिन  में  होगा .

रामभरोसे -ये  मजाक  का  समय  नहीं  है .बता जल्दी नहीं  यही   सब  हो  जायेगा .वहाँ  तो  कई  छेद   है .

सीतासरन  को लगा  यही सही समय है इसे मजा चखाने का  .अपने  अपमान  का  बदला  लेलिया जाये  .

सीतासरन -लैट्रिन  मतलब  लैट्रिन  होता  है  कही  भी  कर दो  ,पानी  डाल  दो  ,बह  कर  सीधे  गड्डे   में  चला  जाता  है.

रामभरोसे  ने  आव देखा  न  ताव   सारा  क्रिया – कर्म  फर्श  में  ही   कर  दिया .पानी  डाले  जा  रहे , मैला

पूरे  फर्श  में  फ़ैल  गया  .रामभरोसे  के  माथे   में  सिकन  पड़ी  -ये  हो  क्या  रहा  ,गलत  जगह  लगता  है  कर दिया  .ई धूर्त  लगता  है  बदला  लेलिया .अब  इसकी   तो  खैर  नहीं .

सीतासरन  को  उठाते  हुए  –ये  बह  ही  नहीं  रहा  ,तुमने  तो कहा  था  सब  गड्ढे   में  चला  जायेगा  .

सीतासरन -कोई  जिन्न थोड़े  ही  न  है  ,काम  किया  सीधे  बोतल  के  अंदर  , चला  जायेगा  .टाइम  लगता  है .

अब  सो  जायो  ,भेजा   न  खाओ .

रामभरोसे  – मेरा  पेट  अब  खाली–खाली  सा  लग  रहा  है  ,भूखे पेट  मुझे  तो  नींद न  आएगी  .दिमाग  में  सभी  मिष्ठान  अभी  भी   घूम  रहे  है  . कुछ तिकड़म  भिड़ाओ  ,भोजन  का  प्रबंध  हो  जाये .

सीतासरन -कुछ  तो  शरम करो ,बेटे  की  ससुराल है . यही कह रहे थे न … बड़ा सम्मान के ठेकेदार बन रहे थे .

मेरे पैर अभी भी धुलवा दो फिर कुछ करूँ.

रामभरोसे -तुम्हारे भी खाने का प्रबंध हो जायेगा .

सीतासरन –

पता था मुझे तुम्हारे चित्त में रासमलायी ,राबड़ी घूम रही  है  ,इसीलिए फ्रीज में रखवा दिया था ,4-6 घंटे और इंतजार कर लो .

रामभरोसे  लेट  गए  नींद  भला  कहा  ,सोचा  मै ही  कुछ  जुगुत  करू  सायद  काम  आजाये.

कराहने  लगे  जोर -जोर  से .सीतासरन  की  फिर  नींद  खुली  ,क्या  हुआ  काहे  मरे  जा  रहे  हो  .

रामभरोसे -तबियत बिगड़ रही है  ,लगता  है  बुखार  आजायेगी  .

सीतासरन -अब तुम ये नौटंकी मेरे सामने तो कम से कम न ही करो .अपने समधी को आवाज लगाओ उन्ही से कहो ,सरम -लाज तो कुछ है नहीं तुमको .

रामभरोसे ,सीतासरन को घूरते हुए -सीतासरन ये समझ लो ये दोस्ती का इंतहान है अगर  आज साथ न दिया  तो समझ लेना फिर .जो करना है तुम्हे ही करना है .

सीतासरन -क्या समझ लेना ,जाओ नहीं कहता .

रामभरोसे -ठीक  है ,मत  कहो ,हमारा साथ  यही  तक  था .

सीतासरन के सामने कसमकस की परिस्थिति .न कहु तो हुक्का -पानी बंद .कल से गांजा कौन पिलायेगा .अपने  दिमाग की चाभी घुमाई .बेइज्जती  होगी तो इसकी होगी मेरा क्या .

 

सीतासरन  ने  आवाज  लगाई -दुबे  जी  ,सो  गए  है  क्या  ?दुबेजी  तुरंत  हडबडते  हुए  दौड़े .

क्या  हुआ  समधी  जी .

सीतासरन -आप   के  समधी  साहब  की  तबियत  कुछ  ठीक  नहीं  लग  रही  है .कुछ  गोली  दवाई  लाइए  .

अयोध्या   प्रसाद घबराते हुए क्या हुआ समधी जी ,तबियत को क्या होगया .

रामभरोसे कराहते  हुए  -बुखार -बुखार सा  लग रहा है  .

अयोध्या   प्रसाद  – आप चिंता  न करे सब ठीक होजायेगा ,अभी ,दवाई लता हूँ .एक गोली खाएंगे सब ठीक हो जायेगा .

परिवार  के  सभी सदस्य भी  दरवाजे  पर  आकर  खड़े  होगये  क्या  होगया  समधी  जी  को  .

अयोध्या प्रसाद -बुखार  की  गोली  आगे  बढ़ाते  हुए  ,ये  लीजिये  सब  ठीक  हो  जायेगा .

रामभरोसे -सीतासरन  की  तरफ  घूरते  हुए .

सीतासरन  हकलाते हुए -वो  क्या  है  दुबे  जी  ,रामभरोसे  भाई  बिना  कुछ  खाये  गोली  नहीं  खाते.

अयोध्या  प्रसाद  विस्मायित होते हुए –

कुछ  समझा  नहीं  ,खाना  खाये  अभी मुश्किल  से  दो  घंटे  ही  हुए  होंगे .

सीतासरन  को  भी  कुछ  न  सूझ  रही  थी  कहे  तो  कहे  क्या  ,हाड़बते  हुए  -वो  तो  दो  घंटा  पहले  खाये रहे  न  .अब  तो  12 बज  गए  दूसरा  दिन  लग  गया  .जो  भी  बचा  हो  लाइए  ,ज्यादा  बहस  न  कीजिये  नहीं  इनकी  तबियत  और  बिगड़   जाएगी .

सब  के  चेहरे, दोनों सनीचर को आचार्य बोध से देख रही  – पगला  गए है लगता  क्या !कोई कह रहा जन्म से भूंखे  है लगता है .

फ्रीज में  जितना  कुछ  था  सब  रख दिया .सब के सब रामभरोसे का मुँह ताक रहे  .बिना  देरी  रामभरोसे सब  चट कर गए .

अयोध्या  प्रसाद-दवाई आगे  बढ़ते  हुए -ये  लीजिये  अब  ये  गोली  खा  लीजिये .

रामभरोसे  –डकार  लेते  हुए – अब  सब  ठीक  है  लेजाइये  ये  दवाई –ववाइ.इतनी  जल्दी  नहीं  खानी  चाहिए.

अयोध्या  प्रसाद-अभी  तो  कहा  था  आपने बुखार  है .

सीतासरन -अब  अपने  आप  ठीक  हो जायेगी  ,आप  भी  जाइये  सो  जाइये .

11-

अगले दिन सुबह ,समधिन  जी  ने  सोचा समधी जी के  उठने  से  पहले  दैनिक  क्रिया  से  निवृत  हो  लिया  जाये  .देखा  तो  बाथरूम  में  चारो  तरफ  गंदगी ही  गंदगी ,पूरे  फर्श  में  मैला  फैला था .

पति  को  आवाज  लगते  हुए  -अजी  सुनते  हो  देखो  तो  ,ये  दाढ़ीजार  तोहार  समधी  का  हाल  किया   है  लैट्रिन  का .

खाने  पर तो  अइसन  टूटे  रहे  जइसे  चार  दिन  उपास  करके  आए रहे  .बुढ़वा –खूसट  का  लाइट  में  भी  लैट्रिन  कहा  करना  है  न  दिखा  .अब या  तुहिन साफ करा .

अयोध्या  प्रसाद –धीरे  बोलो -कही  सुन  न  ले.  नहीं  का  कहेंगे.

समधिन जी -कहेंगे  का  ,मुँह बचा है  कुछ  कहे  का  .बेसरम  है  .हमरे  बबली  के  करम फुट  रहे  जो  ,ईया भुक्खड़ के  घरे  बियाह  दिए .

रामभरोसे  लेटे -लेटे सब  सुन  रहे  थे  ,मन  ही  मन  बड़ा  पछता  भी  रहे  थे  .नाहक  ही  आया बेइज्जती  करवाने  .ये  सब  का  जिम्मेदार  सीतासरन  है  ,इसकी  तो  खबर घर  में  लूंगा .

अभी  यहाँ  से  निकलना  ही  बेहतर  होगा .सीतासरन  के  पिछवाड़े  एक  लात  लगाते  हुए  ,फटाफट  कपडा  पहनो  और  चलो .

दोनों  पेट  के  सनीचर  बिना  किसी  से  कुछ  बोले  चुपचाप  वहाँ  से  निकल  लिए  …

दो पेट के सनीचर -नाटक

यह एक प्रकाशित रचना है ,किसी भी प्रकार से इस रचना के  विषय -वस्तु का प्रयोग न करे.

 

 

 

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