बेजार मोहब्बत है ,तसब्बुर -ऐ—धर्मेन्द्र मिश्र

Sher-

1-बेजार मोहब्बत है ,तसब्बुर -ऐ -अहसास में ही जीने दे .

ऐ खुदा हकीकत से रूबरू न करा ,वहम में ही जीने दे.

2-

जिंदगी एक तमाशा है ये तमाशा रोज देखता हूँ .

फिरभी न जाने क्यों कल होने का इंतजार करता हूँ .

जहा देखो हर तरफ इंसान ही इंसान नजर आते है.

फिरभी नजाने क्यों तन्हाई के आलम में जीता हूँ .

रोज जीता हूँ,रोज मरता हूँ,दोनों के बीच झुलसता हूँ

फिर भी न जाने क्यों ख्वाइश-ऐ-जिंदगी रखता हूँ.

3-

चलता हूँ तो साथ एक करवा नजर आता है ,

मगर कोई अपना नजर नहीं आता है .

4-

हमें आपसे मोहब्बत है या क्या है,

जो भी हो बेइन्तहाई की हद है .

खालिस एक अहसास है ,

आप को भी हो ये लाजमी नहीं.

5-

मौका-ए-दस्तूर था, इश्क़ के बाजार में हमने भी

अपना दिल रख दिया . सबने लाखो में सौदा किया ,

हमारा कोई खरीददार ही न मिला.

6-

मुझे तो नहीं मेरे दिल को बड़ी फुर्सत है. न जाने कहा से ढूढ लाता है अल्फाज मोहब्बत के . सब को इश्क़ में बीमार लगता है ,खैर कुछ भी हो दिल को ये शायराना अंदाज अच्छा लगता है . ग़ालिब का ये सौक अब मुझे भी अच्छा लगता है.

7-

कोई दिल के इतने करीब आया है ,सोये हुए अरमान फिर जगाया है .

खवाब  आँखों में लेके आया है , फिर कोई आज मेरी कुर्बत  में आया है .

दिल ठहरा हुआ था ,चाहत की एक हुक सी उठी है

नाउम्मीदी में भी उम्मीद की एक झलक दिख रही है .

भीड़ में भी  वो  सक्श अपना नजर आया है .

उसमे कही मुझे अपना हमसफ़र नजर आया है .

हर घडी उसे ही देखने को दिल हो रहा है.

किसी अजनबी पे दिल को करार आया है .

खलिश में भी तबस्सुम करू , दिल कह रहा है .

खुद के लिए नहीं ,उसी के लिए दुआ करू दिल कह रहा है .

 

 

 

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