हाइकु-122, ठंड—- सुशील शर्मा

हाइकु-122
ठंड
धुंधला सूर्य
कोहरे की रजाई
ओढ़े धरती
विद्या मंदिर
प्रार्थना भरे स्वर
कांपते कंठ
ठिठुरी ठंड
ठाँव पर ठहरी
ठसक भरे।
ठंडी चादर
ओढ़ कर नदिया
नीर निहारे।
ओस के मोती
दूब की फुनगियां
धूप समेटें।
तिल के लड्डू
गुड़ भरी जलेबी
मुनिया खाती।

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