हाइकु-121 नववर्ष–Sushil Sharma

हाइकु-121
नववर्ष
विदा हो चले
वर्ष सत्रह तुम
चले अकेले।
समेटे तुम
कुछ रुसवाईयाँ
रूठे से लगे।
प्रश्न से तुम
उत्तर अनुत्तर
कैसे मिलेंगे।
विदा के पल
आगत है समय
सपने बुने।
हाइकु-119
 है कश्मकश
तुझे मैं याद रखूं
या भूल जाऊँ।
ये मुख्तसर
अंदाजे बयां तेरा
लुटा जिगर।
ये अदा तेरी
कई लोग मरेंगे
क्या खता मेरी।
एक परी सी
कातिल है निगाहें
तीखी छुरी सी।
तुम्हारा रूप
स्निग्ध और लावण्य
पुष्प स्वरूप।
 प्रेम माधुर्य
तुम्हारा प्रतिरूप
चंद्र किरण
 सांझ सबेरे
मुखरित चेहरे
स्वप्न घनेरे।
 हाइकु-120
हमसफर
रिश्तों की डोर बंधे
जीवन भर।
रिश्ते कहर
न हो विश्वास गर
पीते जहर।
रूठते रिश्ते
अहंकार में डूबे
कितने सस्ते।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Facebook
Twitter
LinkedIn
INSTAGRAM