“हार मानना है मृत्यु”—सूरज कुमार मिश्र

“हार मानना है मृत्यु”

श्वास जब तलक है मुझमे हार मानुंगा नहीँ
कि हार मानना है मृत्यु, मृत्यु हार है नहीं

हैं राह में बिछे ये शूल आंधियां भड़क रहीं
ऐ आसमां दहाड़ता है बिजलियां तड़क रहीं
तो क्या हुआ जो है नहीं कोई भी मेरे साथ में
हुं जानता मैं चलना भी अकेले कालि रात में

कुचल-कुचल के शूल को कदम ये आगे बढ़ रहे
लहू-लुहां से हौंसले हैं मुश्किलों से लड़ रहे
जो शक्ति रोक ले मुझे वो आंधियों में है नहीं
कि हार मानना है मृत्यु, मृत्यु हार है नहीं

जरा से डगमगा गये हैं पांव मेरे राह पर
तो फिर से गिर पड़ा हूं मैं ये है जरा कठिन डगर
गिरा हुं मैं मरा नहीं मैं हूँ अभी तड़प रहा
है दिल मेरा थका नहीं ये दिल अभी धड़क रहा

रहा उमड़ नसों में रक्त उठ के मैं खड़ा हुआ
लगा हूं चलने फिर से लड़ने जिद पे मैं अड़ा हुआ
जो प्राण मांगती विजय तो प्राण त्याग दूँ वहीं
कि हार मानना है मृत्यु, मृत्यु हार है नहीं

©सूरज कुमार मिश्र

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