सुकून का एहसास — मँजु शर्मा (हलवारा )

सुकून का एहसास

                        मधुरा के एन.सी.सी.कैम्प में आठ दिन बहुत मजे से सुबह सवेरे उठना ,दौड़ लगाना , परेड के हिस्सों के विभिन्न अभ्यास करते हुए गुजर गए। नौवें दिन सुबह की रोल काल ( हाजिरी लेने का समय ) में कमांडर ने एलान किया –
          ” आज ग्यारह बजे ” रेड क्रॉस सोसाइटी ” के डॉक्टर्स यहाँ पर रक्तदान कैंप लगाने आ रहे हैं। रक्तदान इस दुनियाँ का महादान है जिसकी बराबरी कोई भी दान नहीं कर सकता है। रक्तदान दुनियाँ में किये जाते रहे दानों में सब से बड़ा दान अर्थात उच्च कोटि का महादान है ,क्योंकि रक्तदान के द्धारा एक इंसान किसी दूसरे इंसान की जान बचा सकता है। अट्ठारह वर्ष से साठ वर्ष का कोई भी स्वस्थ इंसान हर तीसरे-चौथे महीने में रक्तदान कर सकता है। रेडक्रॉस सोसाइटी के लोग कैंप लगा कर रक्त इकट्ठा करते हैं और जरूरतमंद अस्पतालों को पहुँचाते हैं। आप लोगों में से जो कोई भी रक्तदान का इच्छुक हो वे गर्ल्स कैडेट्स अपना नाम प्रधान मैडम के पास और बॉयज़ कैडेट्स ठाकुर सर के पास लिखवा दें। ” थोड़ी देर में ही प्रधान मैडम के पास लड़कियों की लम्बी कतार लग गयी। ठाकुर सर के पास दस पन्द्रह लड़के ही नाम लिखाने के लिए आये।
       मधुरा के हाथ में सीरिंज लगाते हुए डॉ. साहब ने पूछा –
       ” मधुरा लड़के तो डरपोक लगते हैं ,बहुत ही कम लड़कों ने रक्तदान के लिए नाम लिखाये हैं और तुम लड़की हो कर रक्तदान कर रही हो , तुम्हें डर नहीं लग रहा , दर्द नहीं हो रहा है ? ” मधुरा मुस्कुराते हुए कहने लगी —
       ” नहीं सर किसी अनजान व्यक्ति की जान बचाने का माध्यम बनने का सुकून भरा एहसास  मुझे दर्द या डर लगने ही नहीं दे रहा ” तभी फोटोग्राफर ने उन्हें लक्षित करते हुए कैमरे को क्लिक कर दिया। दो दिन के बाद मधुरा का वो मुस्कुराता चेहरा समाचार पत्रों में छपने के साथ ही एन.सी.सी.के ग्रुप हैडक्वार्टर के मुख्य समाचार बोर्ड में टैग हो कर लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित कर रहा था।
 —  मँजु शर्मा (हलवारा )

 

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