विकल्पहीन रक्त — मँजु शर्मा (हलवारा )

लघुकथा — विकल्पहीन रक्त

                मृणाल की गर्भावस्था को नौ महीने पूरे हो गए थे। उसे अस्पताल के लेबर रूम में गए चार घंटे हो गए थे। लेबर रुम से नर्स बाहर आयी और मृणाल के पति विवेक को बताने लगी  –
           ” देखिए बच्चे के गले में गर्भनाल लिपट गयी है , हमें तुरंत ऑपरेशन करना पड़ेगा, आप इन कागजों पर दस्तखत कर दें ,और हाँ जल्दी से जल्दी चार बोतल खून का भी बंदोबस्त कर लीजिये जरुरत पड़ सकती है ” कह कर और कागजों पर दस्तखत करा कर वो तेजी से अंदर चली गयी। चिंतित विवेक भागा भागा रक्तबैंक में गया और रिसेपशन पे रिसेपशनिस्ट से चार बोतल रक्त माँगा। रिसेपशनिस्ट ने पूछा –
           ” ब्लड डोनर कहाँ हैं “
           ” ब्लड डोनर तो नहीं है ,आप चार बोतल ब्लड के जितने पैसे होते हैं ,ले लीजिये “
           ” नहीं पैसे नहीं ,ब्लड के बदले ब्लड ही जमा करना होता हैं “
           ” प्लीज आप समझो ना इट्स वेरी अर्जेन्ट ,मेरी बीवी , ऑपरेशन थियेटर में है उसके लिए जल्दी से जल्दी ब्लड पहुँचाना है , आपको पैसे लेकर ब्लड देने में दिक्कत क्या है “
           ” देखिये मिस्टर रक्त का कोई विकल्प नहीं होता , कयोंकि पैसे से ब्लड नहीं बन जाता है ,ब्लड की जगह ब्लड ही काम आता है ,सब लोग आप ही की तरह सोचने लगें और बिना ब्लड डोनेट किये पैसे देकर ब्लड ले जाएंगे तो ब्लडबैंक में ब्लड कैसे आएगा, ब्लडबैंक तो खाली हो जायेगा , फिर बाकि जरूरतमंदों को कहाँ से और कैसे ब्लड मिल पायेगा ? “
           ” ओ हो ओ ऐसे तो हम लोग सोचते ही नहीं है , ठीक है मैम अभी पैसे लेकर चार बोतल ब्लड दे दीजिये ,अस्पताल में ब्लड पहुँचा कर ,अपने चार ब्लड़ डोनर दोस्तों को लेकर आने का मैं वादा करता हूँ, मेरी बीवी और बच्चे का जीवन खतरे में है ,मैं झूठा वादा नहीं करूँगा मैम ,मुझ पर भरोसा रखिये। “
            ” ओके ,.. मैं आपके ब्लड डोनर्स का वेट करुँगी ।” शाम को उस ब्लड बैंक में प्रसन्नचित्त विवेक लड्डू बाँट रहा था और वहीं के बिस्तरों में विवेक के दस बारह दोस्त मुख पर मुस्कान लिए हाथों में सीरिंज लगवाए हुए पड़े थे।

—  मँजु शर्मा (हलवारा )

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