सरिता – अंकुश्री

सरिता- अंकुश्री

अंकुश्री
प्रेस काॅलोनी, सिदरौल,
नामकुम, रांची-834 010
मो0 8809972549

म्.उंपस रू ंदानेीतममीपदकपूतपजमत/हउंपसण्बवउ

 

(कहानी)
सरिता
– अंकुश्री
सरिता ससुराल पहुंची तो ससुराल वाले उसके सामानों के आसपास आकर जमा हो गये. जब उसने बक्सा खोला तो परिवार के सारे लोग उस पर झुक गये. सास, ननद और जेठानी तो उसे पहले से ही घेरी हुई थी. बक्सा खुलने पर ससुर और देवर भी आ गये. सभी यह जानने के लिये बेताब थे कि ससुराल में वह किसके लिये क्या कपड़े, गहने या उपहार ले कर आयी है.
परिवार के लोग बक्सा के चारों तरफ खड़े थे. वे खड़े रह गये. सरिता समझ गयी कि ससुराल वाले अधिक उम्मीद लगाये हुए थे और उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है. वे अप्रत्याषित क्षण उससे काटे नहीं कट रहे थे. लेकिन वह करे भी तो क्या ! पैसा-पैसा जोड़ कर और कर्ज-उधार लेकर पिताजी ने उसकी शादी की थी. दहेज की मांग पूरी करने और शादी करने के बाद उनके पास बचा ही क्या था कि वे बेटी के बक्सा में ससुराल वालों के लिये भी कुछ दे पाते.
बक्सा में कुछ नहीं पाकर वहां खड़े लोग निराष हो गये. वे अंदर ही अंदर क्रोधित भी हो रहे थे. सास ने स्पष्ट पूछा, ‘‘बहू ! क्या तुम्हारे बाप को इतनी भी अकल नहीं है कि वे परिवार वालों के लिये कुछ भेज देते ? – – तुमने तो समाज में मेरी नाक कटवा दी. – – मैं तो पहले ही मोहन के पापा को कह रही थी कि इस परिवार में शादी मत कीजिये. मगर तुम्हारे बाप ने इन्हें क्या खिला-पिला दिया था कि इनकी मति ही मारी गयी – – .’’
सरिता चुपचाप सुने जा रही थी और उसकी सास बोले जा रही थी, ‘‘दहेज के दिन भी तुम सबों ने ‘थू-थू’ करवा दिया. – – जब दहेज में कुछ देने की औकात नहीं थी तो तुम्हारे मां-बाप ने बेटी पैदा ही क्यों किया था – – ?’’ सरिता की सास मनमाने ढंग से बोले जा रही थी. लेकिन बहू होने के कारण सरिता चुपचाप थी.
ससुराल वालों के लिये सरिता के माता-पिता ने साड़ी, कपड़ा आदि अनेक सामान अलग से दिया था. मैके में सगे-संबंधियों से मिले अनेक उपहार भी वह अपने साथ लायी थी. उसके बक्सा में जो भी सामान थे, सभी उसकी ससुराल में ही काम आने वाले थे. मगर सास की बात ठहरी ! जो मन में आ रहा था, वह बोले जा रही थी. सरिता उनकी बातें सुन कर अंदर ही अंदर सिमट कर रह गयी. कुछ बोल नहीं पायी.
शादी से पहले सरिता ने हर लड़की की तरह ससुराल के बारे में कुछ सपने संजोेये थे. उसने सोचा था कि शादी के बाद एक सुंदर-सलोना पति मिलेगा, जो उसे प्यार से भर देगा. उसने आगे सोचा कि ससुराल में सास-ननद के साथ संबंधों का एक नया आदर्ष उपस्थापित करेगी. सास-बहू और ननद-भाभी के रिष्ते की सारी कटुता वह अपने सद्व्यवहार से दूर कर देगी. उसने यह भी सोचा कि ससुराल में ससुर-देवर से अपने व्यवहार एवं बोली की बदौलत वह उनसे स्नेहिल संबंध स्थापित कर लेगी. वह ससुराल में नये-नये लोग और उनसे नया-नया प्यार मिलने की बात सोची थी.
लेकिन सरिता के संजोये हुए सारे सपने सचमुच सपने ही रह गये. इसका कारण था. उसकी ससुराल वालों द्वारा बहू से लगायी गयी उम्मीदों के सपने. उन सपनों की मूल में था – दहेज-दैत्य. अनेक लड़कियों की तरह सरिता के माता-पिता भी देहज-दैत्य की पूजा अच्छी तरह नहीं कर पाये थे. फलस्वरूप दहेज-दैत्य सरिता पर बुरी तरह कुपित हो गया था. सप्ताह भी नहीं बितने पाया कि उसे ससुराल में प्यार की जगह बात-बेबात फटकार मिलने लगी. ससुराल आने का उसका सारा उत्साह खत्म हो गया था. लोग बात-बात में उसकी उपेक्षा करने लगे. उसने यह कभी नहीं सोचा था कि ससुराल में उसकी पूछ उसके द्वारा साथ लाये हुए सामानों पर निर्भर करेगी.
ससुराल में इतनी उपेक्षा होने लगी कि सरिता उसे बरदास्त नहीं कर पायी. हार कर वह अपने मैके चली गयी. किसी से कहा-संुनी करना सरिता के मैके वालों ने पसंद नहीं किया, क्योंकि उपेक्षा के विरुद्ध बोलना व्यवहारसंगत नहीं लगा. किसी ने मारा-पीटा तो था नहीं कि कुछ कहा-संुना जाये ! ससुराल वालों के कहने या व्यवहार करने के बारे में उसके पास प्रमाण ही क्या था, सिवाये अपने मुंह से कह पाने के ? वह चाहती तो ससुराल वालों के विरुद्ध प्रमाण जुटा सकती थी. लेकिन वह इसमें उलझना नहीं चाहती थी.
जब सरिता की शादी हुई थी तो बी0ए0 का रिजल्ट निकल चुका था. वह फस्र्ट क्लास से बी0ए0 पास कर गयी थी. उसका सपना था कि पढ़-लिख कर पुलिस आफिसर बनेगी. ससुराल से वापस आते वह आई0पी0एस0 की तैयारी में जुट गयी.
शादी के बाद मैके में रहते हुए सरिता का दूसरा साल बीत रहा था. एक दिन उसके भैया ने बताया, ‘‘मोहन को नौकरी से निकाल दिया गया है.’’
पूरी बात सुन कर सरिता बहुत दुखित हुई. उसके ससुर कुछ दिन पहले ही रिटायर कर चुके थे. पति की नौकरी भी जाती रही. बात यह भी थी कि सरिता की तीन-तीन ननदें जवान हो चुकी थीं. उनके शादी के लिये मोहन और उसके पिता हरबंस बाबू बहुत दौड़धूप कर रहे थे. मगर उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी. वे जहां जाते थे दहेज की मांग की जाती. लेकिन वे मांग के मुताबिक दहेज देने की स्थिति में नहीं थे. देते भी कहां से ? पहली बेटी की शादी का कर्ज अभी माथा से उतरा नहीं था. दूसरी बेटी के लिये कहां से इंतजाम करते ?
सरिता की दूसरी ननद की शादी की बात एक जगह चल रही थी. बात कुछ लेन-देन पर पक्की हो गयी थी. हरबंस बाबू के पेंषन और मोहन के वेतन से घर का खर्च चलाना भी मुष्किल था. रुपये बचाने की बात सोची नहीं जा सकती थी. कर्ज मिलने की कहीं से कोई उम्मीद नहीं थी. कर्ज भी कोई उसकी वापसी की उम्मीद देख कर ही देता है.
शादी बहुत मुष्किल से तय हो पायी थी. इसलिये मोहन चाहता था कि किसी तरह से शादी हो जाये. लेकिन समस्या थी रुपये का इंतजाम होने की. वह जिस कंपनी में काम करता था, उसका नकद उसी के जिम्मे रहता था. उसने सोचा कि कंपनी के कुछ रुपये निकाल कर वह शादी में लगा देगा और शादी हो जाने के बाद रुपये का इंतजाम कर वापस रख देगा. यही सोच कर कुछ रुपये निकाल कर वह शादी की तैयारी में खर्च कर दिया. लेकिन उसके दूसरे दिन ही कंपनी में रुपये की जरूरत पड़ गयी. कंपनी के रुपये खर्च करने के आरोप में उसे नौकरी से हटा दिया. हालांकि उसने जो रुपये लिये थे, उसे वापस कर दिया. इसलिये खैरियत हुई कि वह जेल जाने से बच गया. लेकिन बदनामी तो हो ही गयी. मगर नौकरी पर वापस रखने के उसके आग्रह को ठुकरा दिया गया. इस तरह तय शादी भी कट गयी.
सरिता के मायके में रहते हुए डेढ़ साल हो गये थे. इस बीच वह मोहन के पास अनेक पत्र भेज चुकी थी. अपने पिताजी को भी वह तीन-तीन बार ससुराल भेजी थी. परंतु ससुराल वाले उसे न लेने आये, न किसी समाचार की जिज्ञासा ही की.
प्रतियोगिता की तैयारी में सरिता जी-जान से लगी रही. वह लिखित परीक्षा में पास हो गयी. अंतर्विक्षा में भी उसका चयन हो गया. कुछ दिनों में ही उसे बुलावा आया और प्रषिक्षण में भेज दिया गया. उसके परिवार में छायी उदासी खत्म हो गयी. खुषी का वातावरण बन गया.
इस बीच मोहन को दूसरी कंपनी में काम मिल गया था. उसके पिता भी दो दुकानों का एकाउंट लिखने लगे थे. इससे मोहन के परिवार का खर्च चलने लगा था. घर में भूखमरी की नौबत आने से बच गयी थी. जब परिवार को रोटी मिलने लगी तो लड़की की शादी की चिंता फिर सताने लगी. दौड़-धूप का नतीजा हुआ कि एक जगह शादी तय हो गयी. लेकिन फिर रुपये की अड़चन आड़े आ गयी.
हरबंष बाबू ने एक जगह उधार के लिये बात की थी. वहां से उधार मिल जाने की बात पक्की हो जाने पर शादी का दिन वगैरह तय कर लिया गया. इधर-उधर की तैयारियां होने लगीं. लेकिन अफसोस ! शादी के ऐन मौके पर उधार देने वाला मुकर गया. शादी बहुत मुष्किल से तय हुई थी. परिवार के लोग इस प्रयास में लग गये कि शादी किसी तरह संपन्न हो जाये. लेकिन कोई उपाय नहीं सूझ रहा था.
दहेज की बाकी रकम शादी से एक सप्ताह पहले दे देने की बात थी. दो दिन और निकल गये. शादी के सिर्फ पांच दिन बच गये थे. परिवार के लोग चिंतित थे. मां और बहनों के साथ बैठ कर मोहन रुपये के इंतजाम की बातें कर रहा था. हरबंष बाबू भी वहीं बैठे थे. मां ने कहा, ‘‘यदि आज सरिता से संबंध अच्छा रहता तो हमारी सारी समस्याएं खत्म हो जातीं.’’ सास-ससुर दोनों कह रहे थे कि मोहन जाकर सरिता से भेंट करे और उसे बुला लावे. लेकिन मोहन के लिये अपनी पत्नी के सामने घुटने टेकना आसान नहीं था. वह सरिता को पत्नी का प्रेम नहीं दे पाया था. इसलिये अपनी जरूरत के लिये उसे बुला लाने की हिम्मत उसमें नहीं थी. ऐसा करने में उसका स्वाभिमान टकड़ा रहा था.
चिंता और परेषानी के कारण उस रात घर में खाना नहीं बन पाया. सभी बैठे विचार कर रहे थे कि शादी कैसे संपन्न हो. हरबंष बाबू कह रहे थे, ‘‘मैं तो परेषान हो चुका हॅू. अब मुझे किसी से रुपये मिलने की कोई उम्मीद नहीं है. लगता है कि बबली की शादी नहीं हो पायेगी.’’
‘‘षादी होगी, जरूर होगी.’’ इस आवाज से सबका ध्यान दरवाजे की ओर चला गया. दरवाजा के बीचो-बीच सरिता खड़ी थी. पहले तो लोग हिचके, मगर तुरंत परिवार में उत्साह का लहर फैल गया. बाहर खड़ी टैक्सी से ड्ªाईवर सामान उतार रहा था. प्रषिक्षण के दौरान वह छुट्टी लेकर अपनी ननद की शादी में आयी थी.
‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि बबली की शादी है ?’’
‘‘अपने परिवार की खबर रखना हर बहू का कर्तव्य है.’’
सरिता ने कुछ रुपये का इंतजाम कर लिया था. रुपये से भरा ब्रीफकेष सामने खोल दिया. रुपये देख कर सभी दंग रह गये. पूरे परिवार का माहौल यदि बिगड़ा हुआ था तो वह रुपये की कमी के कारण, जिसे सरिता ने पूरी कर दिया था. उसके अचानक आ जाने से परिवार के सभी लोग अचम्भित थे. जिस बहू के साथ उनलोगों ने इतना गलत व्यवहार किया, दहेज के लिये क्या-क्या नहीं कहा, वही बहू आज घर की बेटी के लिये दहेज लेकर आ गयी थी. पूरे परिवार के लिये वह बहू नहीं, देवदूत बन कर खड़ी थी.
सास ने कहा, ‘‘मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि तुम्हें किस मुंह से और क्या बोलूं. हमने तुम्हारे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया है. लेकिन तुम उसे भूल कर बिना बुलाये चली आयी. यह तुम्हारी महानता है, बहुत बड़ी महानता. मैं अपने और परिवार के अन्य लोगों द्वारा तुम्हारे साथ किये गये व्यवहार के लिये बहुत शरमिन्दा हॅू – – .’’
सास की बात के बीच में ही ससुर बोल पड़े, ‘‘तुम इस घर में बहू के रूप में नहीं, ईष्वर के दूत के रूप में आयी हो, बल्कि प्रकट हुई हो.’’ उनकी आंखें डबडबा गयी थीं. उन्हें अपनी गलतियों का अहसास हो चुका था. यदि सरिता इतना जुझाड़ू, लगनषील और मेहनती नहीं रहती तो इसके प्रति कैसा अनर्थ हो जाता ? उन्होंने कहा, ‘‘अगर हो सके तो हमें माफ कर दो !’’
तभी सास भी सरिता के समक्ष हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी, ‘‘हमारी गलतियों के लिये तुम जो भी सज़ा दोगी, वह कम होगी. मैं विनती कर रही हॅू कि हमें माफ कर दो !’’ सास-ससुर के साथ ही ननदों की निगाहें भी सरिता पर टिकी हुई थीं. पति मोहन भी वहीं खड़ा उसे निहार रहा था. उसके भी हाथ जुड़ गये थे. सरिता ने कहा, ‘‘मैं अपने माता-पिता को त्याग कर मैके से ससुराल आयी हॅू. आप ही मेरे माता-पिता हैं. मेरी इच्छा है कि यहां मुझे बहू नहीं, पुत्री का प्यार मिले. बहू और पुत्री का सारा भेद मन का है. पांच दिनों के बाद बबली की शादी हो जायेगी. वह ससुराल चली जायेगी. मेरी दिली इच्छा है और ईष्वर से प्रार्थना है कि इसे भी ससुराल में बहू का नहीं पुत्री का दर्जा मिले.’’
‘‘तुम धन्य हो ! सास ने सरिता को गले से लगाते हुए कहा, ‘‘आज से हमारे जीते-जी कोई बहू ससुराल में प्रताड़ित नहीं होगी. हमारे आस-पास जहां कहीं कोई बहू ससुराल द्वारा प्रताड़ित की जायेगी, समाज की महिलाओं के साथ मैं वहां जाकर उसे प्रताड़ना से मुक्ति दिलाऊंगी और पारिवारिक संबंधों को मधुर बनाने के लिये लोगों को जागृत करूंगी.’’
अपनी सास की बातों से सरिता अपने को बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही थी. वह सास के पैरों पर गिर पड़ी. लेकिन सास ने उसे तुरंत उठा कर अपने गले से लगा लिया, ‘‘बेटी, तुम महान हो !’’
बबली की शादी में लोग व्यस्त हो गये. परिवार के हर सदस्य में स्फूर्ति आ गयी थी. लोग दौड़-दौड़ कर काम कर रहे थे. शादी संपन्न हो जाने पर सरिता प्रषिक्षण पूरा करने के लिये जाने लगी तो ससुराल वाले उसे रेलवे स्टेषन तक छोड़ने गये. रेलगाड़ी खुलने लगी तो सरिता की आंखों में आंसू छलछला आये. छुक-छुक, छुक-छुक करती रेलगाड़ी चल पड़ी. रेलगाड़ी की छुक-छुक के साथ ही सरिता का दिल भी धड़क रहा था. यह धड़कन उसकी जीत की थी, उसकी खुषी की थी.
–0–
(यह प्रमाणित किया जाता है कि ‘सरिता’ कहानी मेरी मौलिक, अप्रकाषित और अप्रसारित रचना है. सुविधानुसार इसका उपयोग किसी भी अंक मंे किया जा सकता है – अंकुश्री)

 

अंकुश्री
सिदरौल, प्रेस काॅलोनी
पोस्ट बाॅक्स 28, नामकुम
रांची-834 010
मो0: 08809972549
म.उंपस रू ंदानेीतममीपदकपूतपजमत/हंउपसण्बवउ

 

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