वही व्यवहार चिकित्सक से करो , जो चिकित्सक से चाहते हो –डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

वही व्यवहार चिकित्सक से करो , जो चिकित्सक से चाहते हो ।

प्रस्तुत लेख मे समाज के प्रतिष्ठित वर्ग की समस्यायों की जानकारी दी जा रही है , जिन्हें समाज चिकित्सक वर्ग के नाम से जानता है। चिकित्सक वर्ग समाज के दुखी रोगियों का उपचार करते हैं । रोगी रोग दूर  होने से अधिक चिकित्सक के व्यवहार से प्रभावित होते हैं मृदु भाषी , सौम्य व्यक्तित्व का  चिकित्सक रोगी का आधा दुख अपने व्यवहार से ही दूर कर देते हैं । जबकि कुछ चिकित्सक रोगी की समस्यायों का बढ़ा चढ़ा कर आकलन करते हैं , और रोगी को रोग से भयाक्रांत कर देते हैं , तभी उपचार का भरोसा देते हैं ।

यह सर्वविदित है की चिकित्सक वर्ग की संख्या आम रोगियों की संख्या के अनुपात मे बहुत कम है । रोगियों और चिकित्सकों का ये बेमेल अनुपात चिकित्सकों को अवसाद ग्रस्त बना रहा है ।

विशेष परिस्थितियाँ :– चिकित्सक , फिजीशियन  कुछ विशेष परिस्थितियो का सामना अक्सर करते हैं ।

1-रोगियों के परिजनो की दादागिरी अक्सर सामने आती है जिसकी व्यथा सभी चिकित्सक वर्ग को व्यथित करती है ।

2- कुछ चिकित्सक कार्य की अधिकता के कारण अनिद्रा के शिकार हो जाते हैं ।

3- कुछ चिकित्सकों मे कार्य की अधिकता निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है , वे संशय ग्रस्त होते हैं ।

4-चिकित्सकों  को कभी –कभी अनावश्यक रूप से रोगियों की शिकायत पर मेडिकल जांच बोर्ड का सामना करना पड़ता है ।

5-चिकित्सक प्रतिदिन रोगियों की मृत्यु एवं परिजनों की संवेदना का साक्षात्कार करते हैं । उपरोक्त कारणो से वे अवसाद ग्रस्त होते हैं ।

 सामान्य रिस्क फ़ैक्टर्स :— 

1-वैवाहिक संबंध टूटना —

चिकित्सक प्रति सप्ताह 48 घंटे कार्य करते हैं । वे शायद ही कभी परिवार के साथ रात्रिभोज मे शामिल होते हैं । फिजीशियन अत्यधिक व्यस्तता के कारण न तो पारिवारिक उत्सवों मे शामिल हो पाते हैं और न ही बच्चों की गतिविधियों मे भागीदार बन पाते हैं । अत  :परिवार भावनात्मक विघटन के कगार पर पहुँच जाता है । एकाकीपन के कारण अलगाव की संभावना बनी रहती है । वैवाहिक संबंधो मे कटुता एवं संबंध विच्छेद फिजीशियन को अवसाद ग्रस्त करती है । वाकई फिजीशियन होने का अर्थ मानसिक तनाव से ग्रस्त होना है ।

2- सामाजिक अलगाव –

फिजीशियन सर्वाधिक एकाकीपन से जूझते हैं । ट्रेनिंग गतिविधियो एवं 48 घंटे प्रति सप्ताह कार्य अवधि के कारण मित्रो एवं परिवार के लिए बहुत कम समय दे पाते हैं । जब वे अन्य स्थलो पर होते हैं तब भी रोगियों एवं औषधियो के संबंध मे ही विचार विमर्श करते हैं । अपने जीवन काल मे बोर्ड परीक्षा की तैयारी , चिकित्सा विज्ञान की तैयारी चिकित्सक को आत्म केन्द्रित , पढ़ाकू एवं अत्यंत प्रतिभा शाली चिंतक एवं विचारक बनती है । इन्ही कारणो से इनमे मित्रता का विकास नहीं हो पाता है ।

3-जीवन साथी से विछोह या मृत्यु का होना –चिकित्सक के पास अपने जीवन साथी की देखभाल के लिए बहुत कम समय होता है । फिजीशियन भावनात्मक रूप से अपनी पत्नी पर निर्भर होते हैं । पत्नी का विछोह उन्हे अवसाद ग्रस्त करता है । अवसाद के कारण फिजीशियन मे स्वयं को हानि पहुंचाने वाले विचार उत्पन्न होते हैं । वे शराब की लत , धूम्रपान , पर स्त्री संबंध आदि बनाते हैं अत्महत्या के विचार आने लगते हैं । असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होकर चाकू या बंदूक भी पास मे रखने लगते हैं ।

आर्थिक तनाव —

यद्ध्यपी चिकित्सक सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक धन उपार्जन की क्षमता रखते हैं , परंतु विडम्बना ये है की वे बचत कम खर्च अधिक करते हैं । कुछ चिकित्सक तो 50 से 60 वर्ष की उम्र मे कर्ज लेते हैं , जैसे गृह कर्ज, शिक्षा कर्ज या वाहन के लिए कर्ज ।

बचपन की घटनाए —जैसे योनाचार , भावनात्मक , शारीरिक हिंसा चिकित्सक को आजीवन अवसाद ग्रस्त करती है ।

अवसाद का पारिवारिक इतिहास —ये चिकित्सक सुग्राही होते हैं ।

सेवा निवृति —- सेवा निवृति जीवन की महत्व पूर्ण घटना है , खालीपन एवं एकाकीपन अवसाद को जन्म देता है ।

आदते —– अवसाद ग्रस्त होने पर अधिकतर चिकित्सक कुछ नहीं करते हैं ,

कुछ समझ ही नहीं पाते की वो अवसाद ग्रस्त हैं , क्योंकि कार्य की अधिकता के कारण वे थकान से चूर होते हैं और ध्यान को दूसरी तरफ लगाने की कोशिश करते हैं । चिकित्सकों का अवसाद को नकारने का ये सामान्य तरीका है की वे सगे सम्बन्धियो , मित्रो से लंबी बातचीत करते हैं , कम्पुटर गेम , फ़ेस बूक , रहस्य मय उपन्यास पढ़ना या चिकित्सक मित्रो के साथ पार्टी मे व्यस्त रहना आदि ।

कुछ चिकित्सक कुकिंग का भी शौक रखते हैं ।

कुछ चिकित्सक अवसाद से बचने के लिए अच्छी पुस्तके पढ़ते हैं , प्रार्थना , साधना , नियमित योगा , गाना नृत्य या मधुर संगीत सुनना , या बच्चों या पालतू जानवरो के साथ खेल कर मन बहलाते हैं ।

अवसाद के कारण चिकित्सक  शीघ्र उत्तेजित हो जाते हैं , चिड़चिड़े हो जाते हैं , या रोगियों पर चिल्लाने लगते हैं ।

अवसाद के कारण ध्यान केन्द्रित करने मे परेशानी होती है क्रियाए शिथिल पड़ जाती हैं , अत्महत्या के विचार भी आने लगते हैं , वजन अधिक बढ्ने या घटने लगता है , भूख कम या अधिक लगने लगती है ।

अवसाद के कारण चिकत्सकों की निद्रा हल्की होती है , या वे निद्रा ग्रस्त रहते हैं या वे जाग्रत अवस्था मे रहते हैं ।

अवसाद ग्रस्त चिकित्सको की मनोदशा  निराशावादी ,आत्मग्लानि से युक्त चिंतातुर होती है । उनके व्यवहार मे एवं कार्यो मे आनंद का अभाव होता है । वे उदास गंभीर व्यस्त होते हैं ।

मेरे लेख का अर्थ यह है की जन साधारण को समझना चाहिए की जिन रोगो से ग्रसित होकर वे अपना उपचार संबन्धित चिकित्सक से करवा रहे हैं , वे भी इन्ही रोगों से जूझ रहे होते हैं । अत :अपनी संवेदना , भावना , व्यग्रता व महत्व को ढाल बना कर चिकित्सकों की भावनाओं से नहीं खेलना चाहिए । भावनाए , उत्तेजना , अहंकार क्रोध किसी भी समस्या का निदान नहीं हैं । अपने चिकित्सक से जिस व्यवहार की आप अपेक्षा करते हैं उसी सौम्य मृदु व्यवहार की चिकित्सक भी जन साधारण से अपेक्षा करते हैं । सौम्य व्यवहार की अपेक्षा एक पक्षीय न होकर द्विपक्षीय करने मे समाज की भलाई है तथा चिकित्सक एवं समाज की प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक है ।

डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव , वरिष्ठ परामर्शदाता (पैथोलोजिस्ट )

सीतापुर

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