”आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी हिंदी के उन्नायक महापुरुष “–Sukhmangal Singh

“आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी हिंदी के उन्नायक महापुरुष “

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Wed, Dec 27, 2017 at 10:51 AM

आचार्य महावीर प्रसाद द्वेदी जी ने अपने युग को साहसिक रूप में साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा और दशा प्रदान किया | द्विवेदी जी बहुआयामी प्रतिभावान व्यक्तित्व के धनी महान मानव पुरुषार्थी पुरुष थे | नपे तुले शब्दों का प्रयोग अपने साहित्य लेखन के माध्यम से करते थे | उनहोंने अपनी बोल-चाल की भाषा में भी कम शब्दों में सच को प्रधानता के साथ रखते और उसे लोगों को मानने को विवष कर देने वाले शव्दों का प्रयोग किया करते रहे | जिसे विविध गोष्ठियों में वर्तमान साहित्यकारों ने स्वीकार किया | उनकी व्यास शैली विपक्षियों को कायल करने के प्रयत्न में बड़े काम की थी |
द्विवेदी जी लिखते हैं कि-‘मेरा विश्वास है कि जन समुदाय के हित चिंतन से मेरा भला हो सकता है |परमात्मा मुझे अपनी दया का पात्र बना सकता है |क्यों कि आत्मा में वही घट -घट में प्रयेक प्राणी के ह्रदय में विराजमान रहता है | बस मेरी यही अंतिम प्रार्थना है |
आधुनिक हिंदी साहित्य का द्वितीय चरण यानी द्विवेदी युग सन १९०० ई से १९१८ तक के नाम से जाना पहिचाना जाता है |द्विवेदी युग का नामकरण आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी १५ मई,१८६४ से २१ दिसंबर १९३८ के गरिमामय व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर किया गया है |इस काल को ‘जागरण सुधार काल’ भी कहा जाता है |

द्विवेदी युग के सुरुआती वर्षों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है वह सन१९०१ में झांसी रेलवे टेलीग्राफी इन्स्पेक्टर के पद पर विराजमान द्विवेदी थे |वे वहां से सरस्वती पत्रिका में लेख और कविताये भेजा करते थे | जो प्रकासित भी होती थी |लेख कविता और आलोचना लिखना इनकी जीवन चर्चा में शुमार हो गयी थी | पत्रिकाओं में आलोचना छपने से उनकी साहितिक जगत मी विद्वता की धाक जम गई थी | वे रूढ़िवादी के विपरीत उसका खंडन अपने साहित्य के माध्यम से सप्रमाण किया करते थे|
द्विवेदी जी ने सन १९०३ में सरस्वती का सम्पादक हुये तो उन्होंने सरस्वती में हिन्दी के साथ – साथ अन्य भाषाओं- बोलियों को भी सरस्वती पत्रिकाओं स्थान दिया |
किसी भी कार्य में पारंगत होना, साहित्य चेतना को जगाना , कठिन से कठिन पप्रठितियो में आने वाले रोड़े को पारकर स्वय को स्थापित करने में उसका वर्तमान, पूर्वजन्म और माता – पिता के पुण्य प्रताप का फल फलीभूत होता है | 
साहित्य में महारत हासिल करना , स्वयं का अध्यन , अनुशीलन , चिंतन – मनन और पूर्वजन्म के पुण्य के फल को उदय होने पर प्रभाव पूर्ण प्रकट होता है |
महावीर जी के पिता व्रिटिस फौज में सिपाही रहते हुये पुराण वाचकर सुनाया करते थे |उनकी हस्त लिखित पुस्तके बेच कर द्विवेदी जी की माता जी ने बच्चों का लालन-पालन किया और अपने स्थानीय गीतों के माध्यम से आगन को गुंजायमान किया |
गरीब किसान परिवार में पैदा हुए द्विवेदी के माता-पिता का प्रभू ,वेद पुराण  के प्रति अगाध प्रेम था |   द्विवेदी जी को अपने माता- पिता नाना-नानी से ज्ञान उनके डी.न.ए में ही रचा पचा था उन्होंने तुलसीकृत रामायण भी पढ़ा था | सरकारी सेवा काल में अंग्रेजों  का व्यवहार उन्हें कहीं से भी अच्छा नहीं लगता था | यही कारण था कि उन्हों ने नौकरी से अपने को स्तीफा दे कर मुक्त कर लिया | द्विवेदी जी की पत्नी भी बहुत स्वाभिमानी थीं | जिससे इनके स्टीफे के उपरान्त सलाह में पत्नी द्वारा यह कहने पर कि ‘कहीं थूक कर फिर चाटा जाता है’ | इससे लगता है कि नारी  पुरुष से ज्ञान आत्म सम्मान में कहीं से भी कम नहीं रही हैं जो आगे भी कायम रह सकता है | दुखद यह रहा की  द्विवेदी जी की पत्नी की मृत्यु गंगा में डूबने से हो गयी |
 आचार्य द्विवेदी जी  का बहुआयामी व्यक्तित्व में एक भाषा -परिकाष्ठा की भूमिका थी | उन्होंने सरस्वती पत्रिका में अपने लेख /कवितायेँ लिख कर कवियों और साहित्यकारों को लेखन की दिशा में सही और ठीक ढंग से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया ,जगाया | उन्होंने कविता का विषय क्या हो ‘रसज्ञ रंजन ‘ के कवि कर्म शीर्षक के माध्यम से ज्ञात करने का ज्ञान प्रदान करने का काम किया |
 द्विवेदी जी लिखते हैं कि – कविता का विषय मनोरंजन और उद्देश्य परम होना चाहिए | जमुना के किनारे केलि -कौतूहल का अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका | न परिकाओं पर प्रबंध लिखने की आवश्यकता है ,न परिकाओं के ‘गतागत’ की पहेलियाँ बुझाने की | अपितु चींटी से लेकर समुद्र पर्वत ,भिक्षुक से लेकर राजापर्यंत मनुष्य -विदु से लेकर समुद्र पर्वत ,जल ,अनंत आकाश ,अनंत पृथ्वी , अनंत पर्वत सभी के वर्णन से मनोरंजन हो सकता है |
 द्विवेदी जी ने अपने साहित्य साधना के माध्यम से साहित्य में प्रमुखता दिया गाँव -किसान को भी | साहित्य में किसान और ग्रामीण किसानों को भी स्थान दी | उन्होंने स्वयं के साथ -साथ अपने मित्रों से भी ‘भारतीय किसानों के उत्थान के उपाय ‘ ‘अवध के जमीदार और कास्तकार ‘ ”खेती की बुरी दशा ‘ जैसे लेखों को प्रकाशित कर किसानों का समर्थन किया |
आचार्य  द्विवेदी के सम्पादन में   ‘सरस्वती पत्रिका  में जगह पाकर हरिऔध ,मैथलीशरण गुप्त ,गोपाल शरण सिंह ,राम चरित उपाध्याय ,राम नरेश त्रिपाठी जैसे प्रतिष्ठित कवियों को लोगों ने जाना -पहिचाना और माना |
हिंदी साहित्य को उचाई प्रदान करने में जहां आचार्य महावीर प्रसाद  द्विवेदी का नाम सुनहरे साहित्य में अंकित होगा , नाम लिया जायेगा वहीं ‘सरस्वती ‘पत्रिका की भूमिका को विशेष स्थान पर रखा जाएगा | सरस्वती का योगदान साहित्य /साहित्यकार कभी भी नही भुला  सकेगा |
आचार्य जी के व्यक्तित्व को किसी भी सीमा से समेटना साहित्यकार की अज्ञानता ही कही जायेगी | हिंदी साहित्य पर चिंतन करने वाले साहित्यकारों को आचार्य महावीर प्रसाद  द्विवेदी जी के साहित्य का अध्ययन उतना  ही आव्श्यक है जितना महाभारत के समय अर्जुन को श्री कृष्ण की | अथवा आखेट करने गए अकबर बादशाह को भूख लगने पर वीरबल के रोटी की | रोटी के मिठास की |
 द्विवेदी जी  बहुआयामी व्यक्तित्व के अद्भुत धनी व्यक्तित्व के महापुरुष हैं | उनमें कवि – लेखक कुशल सम्पादन  ,आलोचक ,अनुवादक ,छंद -संस्कारक ,भाषा-परिस्कारक ,नव काव्य सिद्धांतों के सर्जक ,चिन्तक ,आर्थिक चिन्तक ,कुशल सम्पादक था | भाषाविद कवियों -लेखकों के मार्गदर्शक की भूमिका निभाया |
 द्विवेदी ने दरवारी रीतिकालीन भूमिका में रत साहित्यकारों ,रचनाकारों को आजादी प्राप्ति की अभिलाषा की झलक दिखाई |आजादी के योगदान में साहित्य लेखन को लगाने की प्रेरणा का कार्य किया |राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीयता की अल;ख जगाने का संबल दिया | पत्र -पत्रिकाओं के माध्यम से अभिव्यक्ति का संबाह्क बने |
  द्विवेदी जी के कठिन परिश्रम से लिखी गयी पुस्तक ‘सम्पत्ति शास्त्र ‘ने भारत की अंग्रेजी राज्य में आर्थिक दुखी अवस्था को गहराई से विश्लेषित किया | इस महान हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ विचारक ,चिन्तक ,हिंदी के उन्नायक को  शत -शत हार्दिक नमन |
साभार – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ,हिंदी साहित्य का इतिहास प्रित ८१ |
            सरस्वती पत्रिका (हीरक जयंती १९६३ पृष्ठ १३१ |
             हिंदी साहित्य का इतिहास ,सं नगेन्द्र पृष्ठ ४८७
             महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी जागरण नई दिल्ली  १९७७ पृष्ठ ३७७
            महावीर प्रसाद द्विवेदी :उधृत  पृष्ठ ४३
            ईश्वर दास मारवाड़ी अगस्त १९१५ सरस्वती पत्रिका ,महावीर प्रसाद द्विवेदी                  जुलाई १९१५ , गंगाधर पन्त १९१८ सरस्वती |


Sukhmangal Singh

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