तुम्हे अमीरी का गुमान—धर्मेन्द्र मिश्र

6-तुम्हे अमीरी का गुमान,

तो तुम चलो सीना तान.

जो मिला मुझे  मैं तो,

सब से करू दुआ -सलाम .

7-तुम अपने रस्ते चलो मैं अपने रस्ते चलूँ ,

कब तक तुझे याद कर के जीता रहूँगा ,

कब तक तेरे साये में पड़ा  रहूँगा .

8-मेरी रूह को खुद से अलग कर दे ,

तू मुझे मेरे हाल में ही  छोड़ दे .

तू मुझसे बात करे न सही ,

तू मुझे अपना कहे न सही .

फकत बस इतनी मेरी रूह को,

अपनी खिलकत से अलग कर दे .

9-

बेदर्दी का मरहम लगा गया कोई ,

हमदर्द बन फिर जख्म देगया कोई .

जर्ब है अभी हरा है ,अभी भरा नहीं .

आशनाई बन फिर दिल्लगी कर गया कोई .

नाकश समझ गुमनामी के गिरदाब में,

फिर धकेल गया कोई .

वक्त का नमाजी हूँ फिर भी

काफिर कहता है हर कोई .

सिफर था सिफर हूँ ,

ऐ खुदा तू ही कह  हक़गोई .

10

गुमगश्ता गुमनाम सा हूँ ,मुस्तकिल नहीं कोई इस जहाँ में अपना .

जर्ब हूँ ,गिरदाब में पड़ा हूँ ,कोई नहीं मेरा यहाँ अपना .

न आशना है यहाँ सब मेरे, इज्तिराब हूँ ये हो क्या रहा .

किना नहीं किसी से मेरे जाने का इंतजार क्यों होरहा .

मेरे अपने भी नहीं रहे अपने ये हो क्या रहा .

ऐ खुदा हक़ गोई क्या तू भी नहीं अपना .

खलिश में ही तब्सुम कर रहा ,

क्या करू रोने का हक़ भी नहीं रहा अपना .

11-

हकीकत  से  बेखबर  तेरे दर पे,

आया हूँ एक  अरमान  लेकर  .

हर साँस में तेरा नाम लिख  आया हूँ,

खुदा का पयाम लेकर .

 

12-

गड्ढा खोद के बैठे है कुछ लोग ,

हम गिरेंगे कभी इसी इंतजार ,

में बैठे है अभी भी वो लोग .

 

 

 

 

13-

मस्त-ए-शराब-ए-इश्क़ हो गर,

इक बार मकतब-ए-इश्क़ हो आना .

ये  हुनर मैंने वही से सीखा होसके,

तो तुम भी सीख आना   .

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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