आईना—–अमरेश सिंह भदोरिया

_______मुक्तक_______

आईना
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आईना हूँ इसलिए  सच बोल रहा हूँ।
पूरी हक़ीक़त  को  पूरा  तोल रहा हूँ।
पड़ जाय  ना   दरार   संबंध  मे कहीं,
इसलिए संभल-संभल के बोल रहा हूँ।
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भूँख
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मुफ़लिशी
में जब
भूँख का
सवाल होता है ।
फिर कैसे
कहें कि
हर चेहरे पर
गुलाल होता है ।।
उड़ जाती
नींद रातों की
दिन का भी
चैन छिनता है ,
तब कहीँ
“अमरेश”
हल ये
सवाल
होता है ।।
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उजालों
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जोड़
घटाव
चला
करता है
यहाँ
निवालों का ,
स्वयं ढूढ़ना
पड़ता उत्तर
सभी सवालों का ,
परछांई
तक
गुम हो
जाती है
अँधेरे में
आकर ,
सबको
साथ कहाँ
मिलता है
सदा उजालों का
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समझौता
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महकने
के अधिकार
छिन रहे
चमन में
फूलों से
हमदर्दी
बाँटी जाती है
अब यहाँ बबूलों से
चाह रहा हूँ
मै भी
कुछ वैसा
ही बन जाऊँ,
पर समझौता
हुआ नहीं
अबतक
“अमरेश”
उसूलों से।
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कानून
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लोकतंत्र में झूंठ का
यकीन अभी जिन्दा है।
भृष्टाचारण के लिए संस्कारित
ज़मीन अभी जिन्दा है।
जनगण मन आहत होगा यहाँ
रोज़ सर्पदंस से,
अजगरों के लिए कानून का
आस्तीन अभी जिन्दा है।
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मतलबी जाल
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भूँख से
ब्याकुल
परिंदे बैठे
हैं डाल में ,
बहेलिये
ने दाने बिखेरे
हैं मतलबी
जाल में ,
पापी पेट के
लिए संघर्ष
दोनों ओर
जारी है ,
राम जाने
सुलझेगा
ये प्रश्न
किस
हाल में ।
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ठिकाने
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महफ़िल
में सभी
लोग
अनजाने
नहीं होते ,
कुछ
अल्फ़ाज़
हैं ऐसे कि
पुराने
नही होते ,
हो जाये
शाम जहाँ
कर लेते
हैं बसेरा ,
आवारा
परिन्दों
के ठिकाने
नहीं होते ।
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सच का यकीन
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नया आसमान
नयी ज़मीन
तलाश कर,
जिंदगी के
वास्ते
मंजर
हसीन
तलाश कर,
यदि
रखता है
तू जरा भी
गुमान
हौंसले पे,
तो सियासत
में सच का
यकीन
तलाश कर ।
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पश्चिमी कीलें
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आज
हम लड़ाई
अपने
अस्तित्व
की लड़ रहे ,
सभ्यता के
तख़्त पर
“अमरेश”
कीलें
पश्चिमी
जड़ रहे ,
खो गया
है हमारे
आदर्शों से
पैनापन ,
सत्यम
शिवम्
सुंदरम
सिर्फ
कल्पनाओं
में पढ़ रहे ।
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दीप
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संकल्प
सृजन का
लेकर जब
कलम सिपाही
चलता है ,
अपने मज़बूत
इरादों से वह
हर परिदृश्य
बदलता है ,
घोर अमावस में
काली रातों की
स्याही छंटती है ,
तब जाकर
“अमरेश”
कहीं फिर
दीप दीवाली का
जलता है ।
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बन्दर-बटवल
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वहाँ
तुम्हारे
ख़्वाबों की
अगवानी
होती है ,
यहाँ
हमारे
सपनो की
निगरानी
होती है ,
किसको
कितना
हिस्सा
मिलता है
“अमरेश”
बन्दर-बटवल में ,
हमसे पूंछो
सब मालूम है
मनमानी
होती है ।
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चिनगारी
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झूंठ
और सच
के वादों पर
यहाँ सियासत
चलती है ,
बयानवीरों की
भाषा गिरगिट सा
रंग बदलती है ,
अनुदान खजाने से
पाकर होता है
उजाला महलो में,
अपने
वजूद के
दम पर
चिनगारी
जलती है ।
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अहसास
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ख़ुशी
आजकल
कुछ उदास
रहती है ,
ख़ामोशी
अब यहाँ
आस-पास
रहती है ,
कहने को
हम
जिंदगी के
अहसास
बाँटते हैं ,
और सच
ये है की
खुद को
खुद की
तलाश
रहती है ।
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दर्पण
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भाई के हित
भाई का समर्पण
हमें वो चाहिए ।
दुस्वारियों में
जो साथ दे
लक्ष्मण हमें
वो चाहिए ।
सिर्फ चेहरे
पढ़ लेना ही
अब नही
बाज़ीगरी ,
नियति को भी
पढ़ सके जो
दर्पण हमें
वो चाहिए ।
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अमरेश सिंह भदोरिया
अजीतपुर
लालगंज
रायबरेली उ0 प्र0
पिनकोड-229206
मोबाइल+919450135976
Email-amreshsinghhh@gmail.com

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