नव वर्ष —Sushil Sharma

नव वर्ष कैलेंडर से लटक कर ,गुजर गया यह साल। कुछ मन की खुशियां मिली ,कुछ का रहा मलाल। कष्ट कोहरा त्रासदी ,सहता रहा समाज। जाओ सत्रह आज तुम मिल कर सबसे आज। स्वागत संग शुभकामना नये वर्ष के नाम। Read More …

बपौती ——- मँजु शर्मा

बपौती                          सुबह नाश्ते के साथ चाय की ट्रे लेकर अनु पति सुमित के पास आ कर बैठ गयी और अखबार पढ़ रहे सुमित से आक्रोशि स्वर में बोली – ” कल पड़ौस वाली गुप्ता भाभी बता रही थी भाई Read More …

फायदा — — मँजु शर्मा (हलवारा )

फायदा                     रविवार को सुबह के आठ ही बजे थे ,देव ने पत्नी को आवाज लगाकर कहा –          ” अन्नू ! आज मेरे लिए एक पराठा ज्यादा बनाकर ले आओ ” छुट्टी वाले दिन हमेशा देर से उठने वाले Read More …

सुकून का एहसास — मँजु शर्मा (हलवारा )

सुकून का एहसास                         मधुरा के एन.सी.सी.कैम्प में आठ दिन बहुत मजे से सुबह सवेरे उठना ,दौड़ लगाना , परेड के हिस्सों के विभिन्न अभ्यास करते हुए गुजर गए। नौवें दिन सुबह की रोल काल ( हाजिरी लेने का समय ) Read More …

विकल्पहीन रक्त — मँजु शर्मा (हलवारा )

लघुकथा — विकल्पहीन रक्त                 मृणाल की गर्भावस्था को नौ महीने पूरे हो गए थे। उसे अस्पताल के लेबर रूम में गए चार घंटे हो गए थे। लेबर रुम से नर्स बाहर आयी और मृणाल के पति विवेक को बताने Read More …

कंजूसी—सुशील शर्मा

  कंजूसी कंजूसी धन की भली ,मन का खर्चा लाभ। कंजूसी मन की करे,उसके फूटे भाग। रिश्ते कंजूसी भरे ,ढले स्वार्थ के संग। जीवन सस्ता हो गया, रिश्ते है बदरंग। तन खर्चे सुख मिलत है ,मन खर्चे है प्रेम कंजूसी Read More …

प्रकृति का संरक्षण—सुशील शर्मा

दोहा बन गए दीप-6 सुशील शर्मा प्रकृति का संरक्षण जो मानव करता नहीं ,प्रकृति का सम्मान। रोग कष्ट संग जिए वो ,जल्द जाये श्मशान। प्रकृति का न शोषण करो ,प्रकृति हमारी जान। पशु पक्षी पौधे मनुज ,हैं धरती की शान। Read More …

होकर खफा मुझसे रह सकते हो –सूरज कुमार मिश्र

. होकर खफा मुझसे रह सकते हो तो रह लो हमसे नज़रें मिलाकर बेवफा हमें कह सकते हो तो कह लो हटाकर देख लो तस्वीर मेरी तकिये के नीचे से फिर ख्वाबों की बहारों में बह सकते हो तो बह Read More …

तुम्हारा वो पेन —-सूरज कुमार मिश्र

पेन तुम्हारा वो पेन जो तुम उस दिन एग्जाम के बाद अपनी मेज़ पर छोड़ कर चली गयी थी मैंने आज तक संभाल कर रखा है उस पेन में श्याही नहीं है फिर भी अक्सर मैं उससे लिखा करता हूं Read More …

अजनबी—सूरज कुमार मिश्र

अजनबी कल तलक सख्स मुझसे जो था अज़नबी राह में यूं मिला हमसफर बन गया वो मेरे साथ कुछ दूर तक ही चला पर जरा सा सफर वो जफ़र बन गया ओस की बूंद सा हूं गुलाबों पे मैं धूप Read More …