*भगवान या शैतान* —-सुशील शर्मा

*भगवान या शैतान*
सुशील शर्मा
तुमने पहले मुझे
भगवान का दर्जा दिया
खूब पूजा
बहुत माना
फिर मन भर गया तो
 मुझे इंसान भी
न रहने दिया।
सीधा शैतान का तमगा
टांग दिया मेरे गले में
मेरे चेहरे पर लटके
सभी भगवान के मैडल
नौच लिए तुमने
जैसे सजा के बाद
किसी अधिकारी के
सारे मैडल उतार लिए जाते है।
सिर्फ इसलिये कि
मेरी बातें तुम्हारे बनावटी
सम्मान को भेदती हुई
तुम्हारे अंतर के विकराल
अहंकार को छेड़ गईं।
एक सच ने तुम्हारे अंदर
बैठे हुए अहंकार के नाग को
जगा दिया और फिर वह नाग
टूट पड़ा मेरे सम्मान को
शैतान के तमगे में बदलने।
दोनों प्रतिरूप कितने प्रासंगिक
स्वार्थ की आकांक्षा में
किसी को भगवान बना देना।
और अहम झुलसने पर
उसी को शैतान में बदल देना।
यह भगवान का भाव
और शैतान का भाव
हमारे अहंकार के सिक्के के
दो पहलू है।
हमारा अहंकार संतुष्ट तो
सामने वाला भगवान।
हमारा अहंकार रुष्ट तो
सामने वाला शैतान।

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