मन का द्वंद गहन हो जब भी—Sushil Sharma

मुक्तक
सुशील
मन का द्वंद गहन हो जब भी।
जीवन में अंतर्द्वंद हो जब भी।
मुझ से आकर तुम मिल लेना।
सब दरवाजे बंद हो जब भी।
कठिन रास्तों पर है चलना।
पग पग पर बैठे हैं छलना।
संघर्षों से लोहा लेकर।
मंजिल तुमको निश्चित मिलना।
कभी खुशी कभी गम जीवन में
कष्ट कंटकों के आंगन में।
तुमको आगे बढ़ते जाना।
शिखर शौर्य के निज मधुवन में।

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