-जीवन एक रंगमंच — डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

————-जीवन एक रंगमंच ——–

 जीवन एक रंगमंच है । और इसमें अभिनय करने वाले पात्र कठपुतलियाँ हैं । इन सजीव पात्रों का सूत्रधार कोई अदृश्य शक्ति है , जो जितना सशक्त अभिनय कर लेता है वो उतना अच्छा कलाकार होता है । रंगमंच के पात्र  माता -पिता , पुत्र- पुत्री ,पति – पत्नी या अन्य रिश्तों में होते हैं । कहते हैं “पूत के पाँव पालने में दिखते हैं” । जब पुत्र पढ़ने लिखने योग्य होता है तो उसका पूर्ण ध्यान क्रीडा से दूर कर केवल अध्ययन पर केन्द्रित करने की कोशिश की जाती है । माता –पिता अपने पुत्रों को सीख देते हैं । “खेलोगे कूदोगे तो बनोगे खराब , पढ़ोगे –लिखोगे तो बनोगे नबाब”।

बालपन खोकर प्रकाश पुंज के समक्ष बैठ कर हमारे नौनिहालों को पाठ  रटते देख सकते हैं लेख शब्द्श: कंठस्थ करना है , समझ मे आए या न आए । परिणाम “आगे पाठ पीछे सपाट”। “सुबह का भुला अगर शाम को घर आ जाए तो भुला नहीं कहाता”। पूरा वर्ष व्यतीत होने को आया परंतु माता –पिता अपने पुत्र की रुचि से अनभिज्ञ हैं । एक अच्छे माँ –बाप का फर्ज निभाते –निभाते  माता –पिता खलनायक की भूमिका में आ जाते हैं । अंत में निराशा में सबकुछ सूत्रधार के भरोसे छोड़ कर , कहते हैं “होई हैं वही जो राम रचीराखा , को करी तर्क बढ़ा वहु शाखा” । ज्ञान के साथ तर्क की सीमा निश्चित करने के पश्चात विज्ञान को भी कहीं का नहीं छोड़ा । यदि इन होनहार बालकों को खुशी से खेलने दिया गया होता , उनकी रुचि –अरुचि का ध्यान रख रटने से रोक कर समझने की शक्ति का विकास किया होता,  तो स्थिति भयावह नहीं होती। परिणाम स्वरूप संतान “घर की न घाट की”। न वह उन्नति कर सकता है न परिवार का बोझ उठा सकता है । प्रश्न उठता है? अब माता –पिता क्या करें , “जब चिड़िया चुग गयी खेत”। आज भी माता –पितामायूष होकर कहते हैं , “पूत कपूत को क्या धन संचय । पूत सपूत को क्या धन संचय”।

जीवन के हर उत्सव –पर्व पर अभिनय आवश्यक होता है । रस्मों का बंधन हो या धार्मिक पर्वों का आयोजन , इन सभी अवसरों पर जम कर अभिनय होता है । एक दूसरे से आगे बढ्ने की होड , दिखावे की होड या आस्था की होड , राजनेता बनने की होड सभी अभिनय में संलग्न हैं । जब कला संतों के मुख से कल्याण कारी  माँ सरस्वती के रूप मे वाणी प्रवाह से बहती है तो लाखों लोगों को सुविचार , सत्संग , सन्मार्ग मे ले जाती है । जब कला गुरु मुख से ज्ञान या विज्ञान के अजस्त्र स्त्रोत के रूप में निकलती है तो अनगिनत विध्यार्थियों के भविष्य की नीव मजबूत करती हुई उसपर भविष्य एवं चरित्र की इमारत गढ़ने का मार्ग प्रशस्त करती है । जब कुसंग वश कोई शिष्य किसी कपटी कुटिल गुरु की कला का अनुयाई होता है तो उस कला का रूप घृणित एवं वीभत्स होता है ।

अशिक्षित व्यक्ति पशुवत आचरण करता है । उसमे बुद्धि का प्रयोग करने की शक्ति नाममात्र की होती है । विवेक का पूर्णतया अभाव होता है । उदाहरणार्थ स्वयं के भले –बुरे , हानि –लाभ , जीवन –मरण के परिणाम को समझने की उसमें शक्ति नहीं होती है । गोस्वामी तुलसी दास जी ने समाधान स्वरूप कहा है , “बिन सत्संग विवेक न होई , राम कृपा बिन सुलभ न सोई” । अर्थात पढ़ लिख नहीं पाये तो क्या हुआ सत्संग के माध्यम से अपनी समझ बढ़ा सकते हो । कबीर जी ने कहा है “ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय” । भक्ति योग कर या तो प्रेम रस का छक कर पान कीजिये । कर्म योगी बन कर्म की श्रेष्ठता का गुणगान कीजिये । ज्ञान योगी बन कर ज्ञान की परा काष्ठा को प्राप्त कीजिये । अंतत: सदैव के लिए चिरस्मृति , चिरनिद्रा मे विलीन हो जाइए , यही जीवन के रंगमंच पर जीवन की पटकथा का अंत है ।

03 05 2016                                       डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

सीतापुर

 

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