शिक्षित समाज को शिक्षा देते कुड़ख आदिवासी (अखिलेश सिंह श्रीवास्तव)

शिक्षित समाज को शिक्षा देते कुड़ख आदिवासी

(अखिलेश सिंह श्रीवास्तव)

भारत के वासियों में आदिवासी समूह सदैव से आधुनिक जीवन शैली को आकर्षित करता रहा है जबकि इन प्राचीन जन समूहों ने कभी अरवाचीन जन समूहों के जीवन में झांका तक नही। ये अपने सीमित संसाधनों के साथ अपनी दुनिया में प्रसन्न रहते हैं। इन्हें द्रविड़ श्रेणी में रखा जाये तो बेहतर परिचय होगा। इनकी सामाजिक संरचना भले ही हमसें भिन्न दिखे और रीति रिवाज़ पिछड़े लगें परंतु उनके मूल्य कई मायनों में आज के सभ्य समाज के लिये प्रेरणादायी होेते हैं। हमारे लिये तो वेदों से लेकर कानून के सफ़ों तक अनेक दिशा निर्देश लिखे हैं परंतु ये आदि काल के वासी मौखिक एवं ग्राम पण्ड़ित के निर्देशानुसार ही चलते हैं। तिस पर भी उनकी शैली में कर्तव्य, अधिकार, समानता एवं सम्मान की भावना निश्चछल रूप से दिखती है। इन आदिवासियों का जीवन शैली अध्ययन एक वृहद कार्य है, परंतु इसके एक महत्वपूर्ण अंश विवाह विधि के माध्यम से इनके आचार विचारों पर मनन करते हैं जो वर्तमान समाज के लिये अभिप्रेरणा साबित होंगे।

मानव जीवन में विवाह का विशेष स्थान रहता है और इसी के चलते अनेक बिंदु सामने आते हैं जिससे सामाजिक मूल्यों का पता चलता है। हाल ही में डीडी भारती में कुड़ख आदिवासियों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जो उपरोक्त उल्लेखित विचारों का समर्थन करती दिखी। इस रिपोर्ट से इन आदिवासियों के सामाजिक जीवन के विषय में पता चलता है- द्रविड़ कुड़ख आदिवासी प्राधानतः झारखंड़, छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश के मूल निवासी हैं। पहले प्राकृतिक रंगो से तथा अब गेरू और चूने के संमिश्रण से अपने कच्चे घरों को सुंदर बना के रहते हैं।

इनका मुख्य व्यवसाय मौसमी साधारण कृषि, पशुपालन, वन संपदा से निर्मित वस्तुओं का नज़दीकी हाट बाज़ारों में विक्रय करना है। कुड़ख आदिवासियों के अनुसार उनका ऐतिहासिक संबंध रोहतासगढ़ के राज्य से है। किवदंती है कि एक बार इस राज्य के पुरूष कार्य पर बाहर गये थे तभी दुश्मन ने हमला कर दिया उस वक़्त महिलाओं ने शस्त्र धारण कर राज्य की रक्षा की। तभी से इनमें सामाजिक आयोजनों में स्त्री शौर्य गाथा का चलन चला, जो आज भी बदस्तूर जारी है। विवाह के लिये लड़की लड़का देखने जाना एक प्रारंभिक प्रक्रिया है जिसे साख खरीदने से संबोधित किया जाता है।

यहाँ सामाजिक वरीयता लड़की द्वारा लड़के का चयन है। यदि किसी लड़के को कोई लड़की पसंद करे एवं वह लड़का भी तैयार है तो माता-पिता इसके लिये अपनी सहमति दे देते हैं। तदोपरांत, एक दूसरे के साथ पारिवारिक भेंट लोटा-पानी के अंतर्गत होती है। एक बात विशेष ध्यान देने वाली है दोनो पक्ष ही यदि इस विवाह से सहमत नहीं हैं तो उनका मना करने का तरीक़ा होगा- अभी तो लड़का/लड़की, छोटा/छोटी है चलिये पुनः लोटा-पानी प्रथा में सम्मिलित होते हैं-

घरों के लिपे-पुते आंगन में दोनों पक्ष सम्मिलित होते हैं। इन सभी का पहनावा साधारण होता है सामान्यतः जो वस्त्र सामान्य दिन चर्या में पहनते हैं वे ही सार्वजनिक समारोह में भी पहने रहते हैं। यों देखा जाये तो आडंबर विहीन रिवाज़ों के अंतर्गत कार्य होते हैं। इसमें आम के पत्ते वाली डाली से पानी छिड़का जाता है। लड़का लड़की एक साथ खड़े होते हैं। यदि लड़की तीन क़दम आगे बढ़ती है तो उसकी विवाह स्वीकृति मानी जाती है अन्यथा अस्वीकृति के लिये वह वहीं खड़ी रहेगी। यही नियम लड़के पर भी लागू होते हैं। तत्पश्चात माताएँ दोनो के पैर धुलती है। इस परंपरागत स्वीकृति उपरांत राजी होना के भाव से लोटा देके सांकेतिक अभिव्यक्ति दी जाती है।

इन आदिवासियों में नारी स्वतंत्रता की प्रबलता इस बात से भी दिखती है कि संबंध तैय हो जाने के बाद लड़की अपनी होने वाले भावी घर-ससुराल को देखने, जिस माहौल में उसे रहना हो, उसे समझने के लिये वहाँ जा सकती है, बस रात्रि विश्राम वह उस घर में ना करके पड़ोस में करती है। इसके बाद डाली डाभा की रस्म होती है जो पूरी विवाह प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसमें लड़का पक्ष द्वारा लड़की पक्ष को शादी पक्की का मूल्य देना होता है जो अब मात्र सांकेतिक रह गया है। तत्पश्चात बांगी जोरान की रस्म प्रारंभ होती हैं, पर एक बात पुनः इस रस्म में लड़की पक्ष के लिए विशेषाधिकार को प्रदर्शित करती हैं- कि अब जब सब बात पक्की हो गयी है लड़की का पिता विवाह खर्च देने से मना कर दे तो यह दायित्व लड़के वालों का हो जाता है कि वे सब व्यवस्थाओं का प्रबंध करें। संभवतः यह एक सुरक्षार्थ निर्मित नियम है जो वधु पक्ष को अनुचित आर्थिक दबाव से बचाता है।

परंतु इसके अपवाद भी संभव हैं इसके लिये गांवो की सामाजिक व्यवस्था महत्वपूर्ण रोल निभाती है। इसी क्रमानुक्रम में समारोह के दौरान लड़की का पिता, चाचा आदि लड़के की सांकेतिक मालिश करते है जो हंसी मज़ाक के रूप में पूरी होती है। भोज यह वह दावत होती है जो लड़की पक्ष, लड़के पक्ष को देता है इसमें लड़के वालों को पहले से ही बता दिया जाता है कि लड़की पक्ष द्वारा उन्हें कितने बार भोजन कराया जायेगा एवं लड़के वाले यह स्वीकृति देते हैं कि वे इन दावतों में से कितनी स्वीकारें अर्थात कितनी बार भोजन करेंगे। इन स्वीकारोक्ती में कितनी स्पष्टता हैं कि लड़की पक्ष को तैयारियों मंे कोई दुविधा ना हो।

भोजन की इस परंपरा में उदाहरणार्थ यदि दो बार का भोजन निमंत्रण हो और लड़के वाले एक बार ही खायें तो दूसरे बार के लिए भोजन सामग्री लड़की का पिता लड़के के पिता को दे देता है। इसमें अन्न के अलावा शूकर भी शामिल रहता है। अब दोनों पक्ष अपने-अपने घर आ जाते हैं और मंडप सजता है। मंडप छाने के लिये प्रमुख रूप से शाल के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। गाँव वाले इस मंडप निर्माण में सहयोग करते हैं। पाहन ये इन आदिवासियों के दस्तूरों को विधिवत करने वाला एक पुजारी होता है जो मुर्गा, सिंदूर, गेूंह स्वनिर्मित पेय इत्यादि से नेग दस्तूर पूरा कराता है।

उसके इन पूजा पाठ का उद्देश्य बाधाओं को रोकना और सर्वमंगल कामना है। पैर पड़ने के लिये ये लोग पीछे हाथ बाँध के घुटने के बल बैठ के पूरा माथा टेक कर पैर पड़ते हैं। कुडूख आदिवासी स्त्रियाँ कलश को सजाती हैं एवं सिर में रख के नाच-गाना करती हैं। इन्ही लोक व्यवहारों एवं नेग दस्तूरों के साथ बारात चलना का समय आ जाता है। पुराने समय में तो बारात पैदल ही एक गाँव से दूसरे गाँव नाचते-गाते जाते थे परंतु आज कल गाड़ियों का इस्तेमाल किया जाने लगा है।

फिर भी गाँव के बाहर बारात डेरा डाल देती है, बारात आगमन की सूचना लड़की पक्ष को दी जाती हैं तदोपंरात बारात परोछने की रीत लड़की पक्ष द्वारा निभायी जाती है। यह पुनः एक बार पूरी शादी में महत्वपूर्ण स्थिती रहती है, क्यों कि यदि अभी भी लड़की ने मना कर दिया तो बारात वापिस ले जाना ही एक मेव विकल्प होता है। परोछने आये लोगों एवं लड़के के कुनबे वालों के बीच में नाटकीय लड़ाई होती है जो इस बात का द्योतक है कि लड़की ऐसे ही नहीं ले जा रहे हैं जीत के ले जा रहे हैं। ये रस्म आनंदोत्सव के रूप में संपन्न होती है।

कलश मिलाई की बेला में वधु पक्ष की चाचीयाँ-भाभीयाँ-बहनें सिर पर कलश लिये नृत्य करती हैं और कलश मिलान के रूप में लड़के वालों से यथा योग्य राशि करार अथवा वचन लेती हैं कि उनकी बिटिया के मान सम्मान का पूरा ध्यान रखेंगे, हमारी बच्ची हमारी जान है उसे प्यार से व सुरक्षित रखेंगे। भावों के यह पल उभय पक्षों को नम आंखो के अधीन कर देते हैं। अब समय है विवाह मंडप का जिसके लिये यह सब दस्तूर हुये। शाल पत्रों से निर्मित यह मंडप लोगों के सामूहिक गान से गंूज उठता है।

सगे-संबंधी, दुल्हा-दुुल्हन को कंध पर इस तरह उठाते हैं कि उनके पैर उठाने वाले की छाती तरफ़ और सिर पीठ तरफ़ होते हैं। मंडप में बैठाने के बाद दोनों के सिर पर चाची-भाभी-बहनें या स्वयं माँ तेल डालती है और कंधी करती हैं। लड़का-लड़की की माँग में सिंदूर लगाता है और लड़की की माँ या अन्य सगे संबंधी लड़के के माथे में एवं दोनो कनपटी पर उसी सिंदूर से टीका लगाते हैं। सभी रस्मे पाहन द्वारा धार्मिक विधि से पूर्ण करायी जाती हैं। पूरे विवाह के प्रमुख गीत का भावार्थ है तेरा मेरा मन मिला है सिंदूर-चॉवल तैयार करने को जो सामूहिक गाया जाता है। विवाह उपरांत उसी तरह दोनों वर-वधु को घर के अंदर ले जाया जाता है।

विवाह के पश्चातवर्ती जीवन में भी स़्त्री के लिये कई सुरक्षा नियम निर्धारित हैं। वे हर प्रकार से घर की संपत्ति की एक उत्तराधिकारी बन जाती है जो अपने पति के काम में भी बराबरी की सहभागनी होती है कभी विवाह ओत्तर विवाद होते हैं तो लड़का और लड़की की ग़लतियों पर सामूहिक विचार किया जाता है एवं जो ग़लत हो वह संबंध विच्छेद के साथ दूसरे पक्ष को तय धन राशि बतौर अर्थदंड जमा करता है। परंतु लड़के की ग़लती पर अर्थदंड के साथ संपत्ति से भी एक भाग लड़की को देना पड़ता है। अब दोनो पुनः विवाह करने के लिए स्वतंत्र होते हैं एवं समाज उन्हें साधारण रूप में ही स्वीकारता है। इसे दूसरी बहु या दूसरा दामाद लाना कहते हैं। इस विवाद को ये अनबन कहते हैं।

सामाजिक जुड़ाव, नारी सम्मान व उसकी सुरक्षा, सारलता एवं मितव्ययीता, सामाजिक न्याय एवं उसका सम्मान धार्मिक विधि पालन ये सभी विषय ऐसे हैं जो आज के शिक्षित एवं आधुनिक समाज को सीखना चाहिये क्यों कि यही विषय हमारे बिखराव के कारक भी हैं। से आदिवासी जन समूह विवाह को दो व्यक्तियों या दो परिवारों के अलावा दो गाँवों का संबंध मानते और निभाते हैं। ऐसे मानवीय सोच को वन्दन-नमन।

(साई फीचर्स)

 

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