बोल्शेविक क्रांति के सौ साल (सत्येन्द्र रंजन)

बोल्शेविक क्रांति के सौ साल

(सत्येन्द्र रंजन)

सौ साल पहले इन दिनों रूस में वो घटनाएं हो रही थीं, जो मानव इतिहास को एक अभूतपूर्व धरातल पर ले गईं। फरवरी (रोमन कैलेंडर के हिसाब से मार्च) में वहां श्रमिक वर्ग का विद्रोह हुआ। प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका से जर्जर जारशाही (वहां का राजतंत्र) इसका सामना नहीं कर पाई। इस तरह सदियों पुराने राजतंत्र का अंत हो गया। सत्ता कई विद्रोही गुटों के साझा नेतृत्व के हाथ में आई। इसके दस महीने बाद व्लादीमीर इलिच लेनिन के नेतृत्व में सत्ता-बदल हुआ, जिसे बोल्शेविक क्रांति के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी पत्रकार जॉन रीड इसका रोचक वर्णन किया है कि अक्टूबर (रोमन कैलेंडर के हिसाब से नवंबर) क्रांति के आरंभिक दस दिनों में कैसे सारी दुनिया हिल उठी।

दरअसल, रीड की पुस्तक का ये नाम उस घटना के दीर्घकालिक ऐतिहासिक प्रभाव को भी व्यक्त करता है। दिवंगत ब्रिटिश मार्क्सवादी इतिहासकार एरिक हॉब्सवॉम ने बीसवीं सदी को एक छोटी सदी कहा था। उनके अनुसार ये शताब्दी 1917 से शुरू होकर 1991 तक ही चली। जाहिर है, वे वो काल है, जब तक संयुक्त सोवियत समाजवादी गणराज्य कायम रहा। ये संघ 1917 की उन्हीं घटनाओं के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया था। समाजवाद शब्द 19वीं सदी में चर्चित हो चुका था। कार्ल मार्क्स- फ्रेडरिक एंगेल्स अपनी विचारधारा उसी सदी में प्रतिपादित कर चुके थे। उनसे पहले भी कुछ राजनीति-दर्शनशास्त्रियों ने समाजवाद की कल्पना की थी। लेकिन 1917 के पहले ये धारणा महज विचार जगत का हिस्सा थी। सचमुच कोई राज्य मजदूर-किसान के नाम पर अपनी वैधता का दावा करेगा, ये बात तब तक मानवीय परिकल्पना में नहीं थी। सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी ने यही सिद्ध किया कि ऐसा सचमुच हो सकता है। उसने श्रमिक वर्ग की प्रतिनिधि के रूप में सत्ता हासिल करने का दावा किया। वो दावा कितना वास्तविक था, आज यह बहस का मुद्दा है।

सोवियत व्यवस्था के सर्वसत्तावादी चरित्र के कारण उस दौरान उभरीं अनेक अवांछित प्रवृत्तियां या घटनाएं आज जग-जाहिर हैं। लेकिन जब वो व्यवस्था बनी, तब उसने दुनिया भर में सपने जगाए और उसकी वजह से दूसरे देशों के सत्ताधारी वर्गों में भय पैदा हुआ- यह निर्विवाद है। सपना समता आधारित समाज का था। इस सपने ने दुनिया भर के लाखों लोगों को आकर्षित किया। देखते-देखते लगभग हर देश में कम्युनिस्ट पार्टी/पार्टियां बन गईं। उधर सत्ताधारी वर्गों में भय फैला कि श्रमिक वर्ग कहीं बगावत कर कहीं रूसी तर्ज पर सत्ता अपनी हाथ में ना ले ले। इन दोनों परिघटनाओं के परिणामस्वरूप ही यूरोप और यहां तक कि अमेरिका में भी कल्याणकारी सरकार की धारणा प्रचलित हुईं। सोवियत क्रांति से दुनिया में बने वैचारिक परिदृश्य का असर बीसवीं सदी के मध्य के बाद एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के शिकंजे से आजाद हुई कई देशों में दिखा। विज्ञान, तकनीक और नवजागरण के साथ इस नई प्रकार की (यानी साम्यवादी) सत्ता व्यवस्था के उदय से नई दुनिया बनने का भरोसा (या सपना कहें) दुनिया के बहुत बड़े जनमत में पैदा हुआ।

आज- 2017 में- जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो वह भरोसा हिला हुआ दिखता है। सोवियत संघ का 26 वर्ष पहले पटाक्षेप हो चुका है। समाजवादी व्यवस्था होने का दावा सिर्फ चीन, क्यूबा, वियतनाम जैसे गिने-चुने देशों का रह गया है, लेकिन उन्होंने जो अर्थव्यवस्था अपनाई है, क्या वह अपने वास्तविक चरित्र में समाजवादी है, इस सवाल पर हर चर्चा में तीखे मतभेद उभरते हैं। इन व्यवस्थाओं में असहमति और वैयक्तिक स्वतंत्रताओं के दमन से उठे सवाल दीगर हैं। यह बेहिचक कहा जा सकता है कि मानव विकास में भारी निवेश और आम जन के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार के बावजूद इन देशों की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टियां अपने पक्ष में जनतांत्रिक सहमति हासिल नहीं कर पाई हैं। इसलिए उनकी छवि आयरन हैंड से राज करने वाली पार्टियों की बनी हुई है। क्या उन देशों के भीतर भी सोवियत संघ जैसा जन असंतोष पल रहा है? क्या वहां भी जन आक्रोश का वैसा उबाल आ सकता है, जिससे एक वहां के लोग भी अपनी वर्तमान राज्य-व्यवस्था को पलट देंगे? इस बारे में हम कुछ भी निश्चित रूप से कहने की स्थिति में नहीं हैं।

दूसरी तरफ पश्चिमी देश हैं, जिन्होंने खुद को साम्यवाद से बचाने के लिए राजनीतिक लोकतंत्र के साथ कल्याणकारी राज्य की अवधारणा अपनाई। इसके तहत उन्होंने अपने नागरिकों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के बेहतरीन इंतजाम किए। इसके लिए मॉडल 1929 की महामंदी के बाद अमेरिका में अपनाई गई न्यू डील अर्थव्यवस्था बना। पूंजीवाद को विनियमित कर और ऊंची टैक्स दरों के साथ वहां की सरकारों ने जन-कल्याणकारी मॉडल के लिए संसाधन जुटाए। नव-औपनिवेशिक शोषण से प्राप्त धन भी वह कारण था, जिससे तब ये मॉडल व्यावहारिक रूप ले सका। लेकिन 1980 के दशक में रोनाल्ड रेगन- मार्गरेट थैचर के नेतृत्व में नव-उदारवाद प्रचलन में आया। 1991 में सोवियत खेमे के ढहने के बाद ये आर्थिक विचारधारा बेलगाम होकर सारी दुनिया में फैली।

यह मानने का आधार है कि इसी का परिणाम 2007 से अमेरिका, फिर यूरोप और दुनिया के अनेक देशों में शुरू हुई मंदी है। इस मंदी के प्रभावों से विश्व अभी तक नहीं उभर पाया है। अब गुजरे एक दशक में विकसित देशों में अपनाई गई किफायत और सामाजिक सुरक्षाओं में कटौती की नीतियों का प्रभाव उन देशों की आंतरिक स्थिति पर पड़ रहा है। डोनल्ड ट्रंप, ब्रेग्जिट, मेरी ली पेन तथा विभिन्न यूरोपीय देशों में धुर दक्षिणपंथी नेताओं का उभार इसी घटनाक्रम की परिणति है। उधर लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों में इसी सदी के पहले दशक में आया वामपंथी दलों के उभार का दौर भी पलट गया दिखता है। दुनिया भर में दिख रहे रूझानों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह न सिर्फ दक्षिणपंथ, बल्कि धुर-दक्षिणपंथ के उभार का दौर है।

जब ऐसा वक्त हो, तब सोवियत क्रांति की शताब्दी मनाना एक विडंबना महसूस हो सकता है। लेकिन इसके साथ एक दूसरी विडंबना भी है, जिसके उल्लेख के बिना ये चर्चा पूरी हो नहीं हो सकती। 1991 में सोवियत संघ के विखंडन के तुरंत बाद अमेरिकी राजनीति-शास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा ने एंड ऑफ हिस्ट्री नामक बहुचर्चित किताब लिखी थी। इसमें उन्होंने घोषणा की थी कि दुनिया में विचारधाराओं के संघर्ष की अंतिम रूप से समाप्ति हो गई है। इसमें जीत पूंजीवाद, उदारवाद और लोकतंत्र की हुई है। अब सारी दुनिया इसी अमेरिकी (अथवा पश्चिमी) मॉडल पर चलेगी। लेकिन 2013 आते-आते फुकुयामा का ये भ्रम टूट गया। 2016 में तो उन्होंने अमेरिका को नाकाम राज्य घोषित कर दिया। डोनल्ड ट्रंप की जीत को इसी विफलता का परिणाम माना गया है। इस परिघटना की तुलना 1930 के दशक में जर्मनी में हिटलर के उदय से की जा रही है। यानी एक तरफ अगर सोवियत मॉडल विफल रहा, तो दूसरी तरफ उदारवादी लोकतंत्र का मॉडल भी गहरे संकट में फंस चुका है।

इस बीच अनेक लोकतांत्रिक देशों में रूझान स्थापित पार्टियों के अलोकप्रिय होने का है। वहां का राजनीतिक कथानक लिख रहे हैं। अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप पारंपरिक रिपब्लिकन नेता नहीं हैं। बाहर से आकर उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के समर्थन आधार को हथिया लिया। डेमोक्रेटिक पार्टी में बर्नी सैंडर्स की लोकप्रियता दूसरी तरफ (यानी वामपंथ) भी ऐसे ही घटनाक्रम का प्रमाण है। फ्रांस में मतदाता सोशलिस्ट और दक्षिणपंथी रिपब्लिकन पार्टियों से अलग विकल्पों के इर्द-गिर्द गोलबंद हुए हैं। स्पेन में पोदेमॉस और ग्रीस में सिरीजा पार्टियों का उदय तथा पुर्तगाल में एक कम्युनिस्ट का राष्ट्रपति बनना भी ऐसे ही घटनाक्रम की मिसाल है। तात्पर्य यह कि बेशक एक तरफ धुर दक्षिणपंथ सफल होता दिखा है, लेकिन साथ ही वामपंथ की नई धाराएं भी लोकप्रिय हुई हैं। डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद वहां डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ग्रुप की सदस्यता में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। 2015 में मेरियम-वेबस्टर डिक्शनरी ने ेवबपंसपेउ को साल का सबसे चर्चित शब्द घोषित किया था, क्योंकि उसकी वेबसाइट पर सबसे ज्यादा तलाश इसी शब्द की हुई थी।

आधुनिक अर्थों में समाजवाद क्या है, यह भी आज गंभीर विचार-विमर्श का विषय है। ये और बात है कि 2016 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने पोस्टद ट़ूथ शब्द को साल का सबसे चर्चित शब्द घोषित किया। ऐसा धुर दक्षिणपंथ को अमेरिका और ब्रिटेन में मिली सफलताओँ के कारण हुआ। मगर ट्रंप की जीत और ब्रेग्जिट- दोनों घटनाओं को पूंजीवादी लोकतंत्र के समक्ष उपस्थित घोर संकट का ही संकेत माना गया है। यानी कहा जा सकता है कि साम्यवादी व्यवस्थाओं के ढहने के बाद उदारवादी पूंजीवाद की नाकामी भी उजागर हो गई है। विकसित देशों में आय एवं धन की विषमता का सबसे चर्चित मुद्दा बनना और स्थापित दलों के सामने औचित्य का प्रश्न खड़ा होना आखिर इस विफलता के अलावा और किस बात के सूचक हैं? इन्हीं परिस्थितियों में वामपंथ की नई संभावनाओं पर अनुमान लगाए जा रहे हैं। हाल में द न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे लेख व्हांटद्यस लेफ्ट ऑफ कम्युगनिकेशन में कहा गया- बड़े आर्थिक परिवर्तन और सामाजिक उथल-पुथल की अभी हमारे सामने शुरुआत ही हुई है।

चूंकि अति विषमताकारी तकनीक-पूंजीवाद उपयुक्त वेतन वाली नौकरियां मुहैया कराने में विफल रहा है, इसलिए नौजवान अधिक क्रांतिकारी (रैडिकल) आर्थिक कार्यसूची को अपना सकते हैं। नई आर्थिक व्यवस्था में एक नया वामपंथ- ह्वाइट कॉलर और ब्लू कॉलर दोनों प्रकार के वंचित तबकों को एकजुट कर सकता है। अधिक न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने वाले राज्य की मांग पहले ही सामने आ चुकी है। यूनिवर्सल बेसिक इनकम (सार्वजनिन बुनियादी आय) का विचार- जिसके प्रयोग नीदरलैंड्स और फिनलैंड में हो रहे हैं- मार्क्स की साम्यवाद की उस दृष्टि के करीब है, जिसमें सबको उनकी जरूरत के हिसाब से आपूर्ति करने की बात कही गई थी। मार्क्स ने इस भावना को क्षमता के अनुसार काम और आवश्यकता के अऩुसार पूर्ति के रूप में व्यक्त किया था।

जब ऐसे विश्लेषण किए जा रहे हों, तो क्या यह कहा जा सकता है कि समाजवाद की विचारधारा हमेशा के लिए दफना दी गई है? विश्व के वर्तमान परिदृश्य को ध्यान में रखें यही कहा जाना चाहिए कि जैसे संकटग्रस्त होने के बावजूद उदारवाद और लोकतंत्र की प्रासंगिकता पर किसी को शक नहीं है, वैसा ही वामपंथ/समाजवाद के बारे में भी माना जाना चाहिए। दरअसल, अब ये कहने का आधार बनता है कि सबकी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति और समता की दिशा में बढ़ते हुए ही उदारवाद और लोकतंत्र का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। 1917 की क्रांति से इस दिशा में प्रगति हुई, तो दुनिया में लोकतंत्र एवं उदारवाद का भी प्रसार हुआ। जब वैश्विक क्षितिज पर समाजवादी सपने धूमिल हुए, तो दो दशकों के भीतर पूंजीवाद ऐसे बेलगाम रूप में सामने आया, जिसके परिणामस्वरूप आज- 2017 में लोकतंत्र और उदारवाद के सामने गहन चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

बहरहाल, ऐसे अनेक देशों में जहां कभी साम्यवाद को खौफनाक शब्द माना जाता था और खुद को समाजवाद कहना सुरक्षित नहीं था, वहां की राजनीति में आज समाजवादी एजेंडा लोकप्रिय हुआ है। तो उससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उन देशों के लोग लोकतंत्र और उदारवाद की रक्षा के लिए वामपंथ से उम्मीद जोड़ रहे हैं। निहितार्थ यह कि सोवियत संघ के विखंडन या चीन के विचलन से समाजवाद का पटाक्षेप नहीं हुआ। बल्कि अब दुनिया के एक बड़े जन-मानस में इसकी नई प्रासंगिकता बनी है। इसका व्यावहारिक ढांचा कैसा होगा- इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि सोवियत व्यवस्था भले ढह गई, लेकिन बोल्शेविक क्रांति से दुनिया के गरीब-वंचित समूहों और बुद्धिजीवी वर्गों में जो नई जन चेतना और अधिकार भाव पैदा हुआ, वह न केवल अक्षुण्ण है, बल्कि उसका निरंतर प्रसार हो रहा है। और जब ऐसा हो रहा है, तो यह संभव नहीं है सत्ता-तंत्र उससे अप्रभावित बना रहें।

(साई फीचर्स)

 

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